जोधपुर. अगर यूं कहें कि विज्ञान पर आस्था भारी हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सामुजा गांव में स्थित सामुजेश्वर महादेव मंदिर अपनी कई अकल्पनीय, अविश्वासनीय व अद्धुत कथाओं के लिए क्षेत्र में ही नहीं संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध हैं।य् यहां महाशिवरात्री के पवं पर रात को बनने वाला शंभू रोठ अपने आप में कई विशेषताओं से पूरिपूर्ण हैं। यहंा घर घर से प्रसाद के रूप में आटा एकत्रित कर यह रोठ बनाया जाता है जिसे शंभू रोठ कहते है। कई किसान इसे कुंभ का भंडार भी कहते है। इस शंभू रोठ की विशेषताओं के बारे में ग्रामीण बनाते हैं कि चालीस किलो आटे से मात्र दो रोठ बीस बीस किलो के बनाए जाते है। दो इसलिए बनाये जाते हैं कि यहां पर किसान वर्ग खरीफ और रबी की फसलें आगामी समय में कैसी होगी। यह विश्वास हो जाता है कि क्षेत्र में कैसा जमाना होगा अर्थात फसलें कैसी होगी। इस भरोसे से ही किसान फिर खेती करता हैं। इसको बनाने तथा पकाने तक की पुरी विधि हेै जिसके तहत वर्ष में एक बार महाशिवरात्री को बनने वाला शंभू रोठ पहले पहर से आटा गंूथना शुरू होता हैं तथा जब दुसरी आरती होती हेै तो दो रोठ बनाकर उनकी पुजा अर्चना की जाती हैं तथा उसे पकाने के लिए आग में डाला जाता है। तीसरी आरती में उसे पलटा जाता हैं और चौथी आरती जब होती हेै तो शंभू रोठ बनकर तैयार हो जाता है, जिसका ग्रामीण एकत्रित होक चूरमा बनाते हैं तथा भगवान शिव को भोग लगाते है। जिसे लोग अपने अन्न, धन के भंडार में रखते हैं जिससे घर में अन्न और धन की कमी ना हो इसे कुभ का भंडारा भी कहते है। सात सौ ग्राम गुड व घी में चुरमा में मिठास व घी बराबर आता हैं यह बात दिखने व समझने में अद्धुत और अकल्पनीय लगती है लेकिन यह हकीकत है। इस बार पकने वाले शंभू रोठ से दोनो जमाने अच्छे बताए जा रहे है। इस मौके पर पंडित राजु महाराज, पंडित टिकु महाराज, सरपंच सुजाराम चौधरी, समाजसेवी पुरषोत्तम श्रीमाली, श्री पार्षद अनिल गटाणी सहित सैकड़ो श्रद्धालु उपस्थित थे।
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