जोधपुर. भारतीय संस्कृति में दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति तथा उनके प्रति श्रद्धा से जुड़ा पर्व 'श्राद्ध मंगलवार को आरंभ हो जाएगा । प्रथम दिन पूर्णिमा का श्राद्ध मनाया जाएगा। इस दिन भारतीय कैलेंडर के तिथि अनुसार देवलोक हुए पूर्वजों के नाम पर सगोत्र उच्चारण कर तिल, जौ, कच्चे दूध, पुष्प, डाब के साथ घरों अथवा पवित्र जलाशयों पर तर्पण किया जाएगा । पं. ओमदत्त शंकर ने बताया कि पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध मंगलवार 1 सितम्बर को और प्रतिपदा का श्राद्ध 2 सितम्बर को होगा। द्वितीया का श्राद्ध 3 सितम्बर गुरुवार को होगा । इस बार 4 सितम्बर को द्वितीया तिथी को कोई भी श्राद्ध तिथी नहीं होगी । तारीख 5 सितम्बर से लगातार सभी तिथी अपराह्न में होने से सभी श्राद्ध उसी तिथी को हो सकेंगे। इसमें कोई घटत - बढ़त नहीं हैं । शास्त्रोक्त विधान के अनुसार एक पखवाड़े तक पितृपक्ष के दौरान मांगलिक कार्य टाले जाएंगे।
मातामह श्राद्ध 17 अक्टूबर को
आश्विन (आसोज ) कृष्ण पक्ष को श्राद्ध पक्ष कहते है । इसमें दिवंगत आत्माओं को उनके स्वर्गवास की तिथी को उनका श्राद्ध निमित्त तर्पण आदि करते है । यहां अपराह्न के समय मृत्यु तिथी हो , उस दिन संबंधित दिवंगत पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है। सन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी को करते हैं व यान दुघर्टना , विष शस्त्रादि से अपमृत्यु प्राप्त वालों का श्राद्ध चतुर्दशी को करते हैं । अमावस्या को सर्व पितृ और मातामह ( नाना ) मातामही ( नानी ) का श्राद्ध आश्विन शुक्ल प्रतिप्रदा( नवरात्री) के दिन करते है । इस बार बीच में अधिक मास ( पुरुषोत्तम मास ) आने से मातामह श्राद्ध 17 अक्टूबर को हो सकेगा । अधिक मास के कारण इस साल श्राद्ध समाप्ति के अगले दिन से नवरात्रि पूजा शुरू नहीं होगी।
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