जोधपुर में दिनोंदिन यहां बढ़ रहा है कचरे का पहाड़, गीला और सूखा कचरा संग्रहण के दावों के बीच निस्तारण तक नहीं

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अविनाश केवलिया/जोधपुर. हमारे सभी वार्ड डोर टू डोर कलेक्शन से जुड़ गए हैं। हर वार्ड में औसतन तीन से चार वाहन गीला और सूखा कचरे को अलग-अलग संग्रहित करने के लिए आते हैं। यहां से एक कॉमन डम्पिंग साइट पर डाला जाता है। लेकिन सबसे बड़ी आश्चर्य की बात यह है कि पूरे शहर का यह कचरा केरू डम्पिंग यार्ड साइट पर वर्षों से डाला जा रहा है। करीब 500 बीघा जमीन पर अब तक 20 लाख टन से भी अधिक कचरा जमा हो चुका है। यह तब जब कचरा निस्तारण के लिए कई प्लांट और तकनीक के प्रयास होते रहे हैं। हमारे शहर से एकत्रित होने वाले कचरे के निस्तारण पर विस्तृत रिपोट...

नम्बर गेम...
- 10 लाख से अधिक आबादी क्षेत्र का कचरा नगर निगम करता है एकत्रित।
- 650 टन कचरा प्रतिदिन होता है एकत्रित।
- 15 साल से केरू डम्पिंग यार्ड में लैंड फिल के लिए डाल रहे कचरा।
- 20 लाख टन से अधिक कचरा अब तक डाला जा चुका।
- 2 बार वेस्ट मैनेजमेंट के प्लांट की प्रक्रिया अपनाई गई, लेकिन हुई फेल।
- 500 बीघा जमीन पर डाला जा रहा है शहर का कचरा
- 650 ग्राम प्रति व्यक्ति औसत एक दिन में कचरा होता है पैदा।

औसतन 650 ग्राम कचरा प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन
करीब 10 लाख की आबादी वाले नगर निगम क्षेत्र से प्रतिदिन 100 से ज्यादा ट्रक व ट्रैक्टर के जरिये कचरा एकत्रित किया जाता है। केरू डम्पिंग यार्ड में प्रतिदिन करीब 650 टन कचरा एकत्रित होता है। यह आंकड़ा हर वर्ष बढ़ता है। इस लिहाज से औसतन एक व्यक्ति 650 ग्राम कचरा जनरेट करता है।

डम्पिंग यार्ड के हाल
शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर केरू डम्पिंग यार्ड साइट करीब 15 साल पुरानी है। 500 बीघा जमीन का लैंड फिल के लिए लिया गया। यहां तब खाद बनाने का एक प्रोजेक्ट लगाया गया था। अभी निस्तारण के सभी प्रयास लगभग बंद हैं। मौके पर कचरे के पहाड़ से बन गए हैं। दूर-दूर तक जहां नजर डालें कचरा और दुर्गंध। कुछ कचरा बीनने वाले कचरे से वस्तुएं तलाशते दिखते हैं।

कचरा निस्तारण के लिए यह प्रयास हुए
1. बायो माइनिंग का प्लांट : कचरे के निस्तारण के लिए बायो माइनिंग का प्लांट करीब 2005 में लगाया गया था। यह प्लांट करीब 4 साल तक चला। लेकिन इसके बाद राजस्व ज्यादा नहीं आया तो संबंधित कंपनी ने काम बंद कर दिया। तब से मशीनें लगी हेै जो अब धंूल फांक रही हैं।
2. कचरे से बिजली बनाना : वेस्ट टू एनर्जी का एक प्रोजेक्ट 5 साल पहले कागजों में लाया। कचरे से बिजली बनाने के लिए संबंधित कंपनी को जमीन भी आवंटित हो गई। लेकिन इसके बाद काम आगे नहीं बढ़ा। कभी बिजली की दरों को लेकर तो कभी अन्य प्रकरण को लेकर यह प्लांट धरातल पर नहीं आ पाया। इससे 20 मेगावाट बिजली बनानी थी। लेकिन पांच साल से यह प्रक्रिया अटकी हुई है।
3. वेट वेस्ट डिस्पोजल : गीला कचरा निस्तारण का प्लांट केरू डम्पिंग यार्ड में ही लगाया गया है। इसके लिए साफ सफाई तो हो गई लेकिन अब तक गीला कचरा यहां निस्तारण के लिए नहीं डाला गया है। यहां निस्तारण रसायन तकनीक से गीले कचरे को गला कर खाद बनाने का है। शहर में गीला और सूखा कचरा अलग-अलग यार्ड नहीं पहुंचने के कारण परेशानी है।
4. मेटेरियल रिकवरी फैसिलिटी : निगम ने कचरा निस्तारण के लिए अब मेटेरियल रिकवरी फैसिलिटी सेंटर लगाया गया है। इसमें कचरे में से अलग-अलग पदार्थ अलग करने की तैयारी है। लेकिन यह प्रक्रिया काफी जटिल है। कचरे में आने वाले कपड़े, मैटल, प्लास्टिक, ग्लास, पेपर, लेदर व लकड़ी को अलग-अलग किया जाता है।

वेस्ट मैनेजमेंट की कुछ अच्छी बातें
1. डोर टू डोर कचरा संग्रहण: पिछले एक साल में शुरू हुआ है। हालांकि इसकी पहुंच शत-प्रतिशत और घरों से गीला-सूखा कचरा एकत्रित करने की प्रक्रिया को हासिल नहीं कर पाई है।
2. हैजार्डियस वेस्ट का निस्तारण: जोधपुर ही देश के उन चुनिंदा शहरों में शामिल है जहां हैजार्डियस वेस्ट का निस्तारण होता है। इसके लिए अलग से प्लांट भी लगा रखा है।
3. जीपीएस सिस्टम: सभी कचरा संग्रहण वाहन जीपीएस सिस्टम से जुड़े हुए हैं। जिससे घरों से कचरा समय पर उठता है और डम्पिंग साइट से भी केरू यार्ड में पहुंचने का रिकॉर्ड संधारित किया जाता है।

इनका कहना...
पिछली बार से बेहतर
वेस्ट मैनेजमेंट में कई बातें हमारी सुधरी है। कचरा निस्तारण की जहां तक बात है उसमें कुछ काम करने की जरूरत है। स्वच्छता सर्वेक्षण में इसी वेस्ट मैनेजमेंट में हम पिछली बार की तुलना में अच्छी स्थिति में है। कुछ नम्बर डम्पिंग साइट के लिहाज से कट सकते हैं। लेकिन फिर भी हम पिछली बार की तुलना में बेहतर होंगे।
- सुरेश कुमार ओला, आयुक्त, नगर निगम जोधपुर

हमने तो पूरे किए थे प्रयास
मेरे कार्यकाल में तो काम शुरू हुआ था। पहले डिस्पोजल प्लंाट शुरू करवाया था जो कि मेरे कार्यकाल तक तो चल रहा था। हमने को व्यवस्थाएं भी ठीक करवाई जो कचरे के पहाड़ लग गए थे उनको समतल करवाया, बाद वालों ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
- रामेश्वर दाधीच, पूर्व महापौर

राज्य सरकार का नहीं मिला सहयोग
हमने वेस्ट टू एनर्जी प्रोजेक्ट को लांच किया था। इसमें 3 मेगावाट बिजली प्रतिदिन 400 टन कचरा उपयोग कर बननी थी। जमीन भी दे दी, एग्रीमेंट कर दिया। कंपनी ने 5 करोड़ की बैंक गारंटी भी दी थी। लेकिन राज्य सरकार की ओर से पावर परचेज एग्रीमेंट नहीं होने से काम शुरू नहीं हो पाया।
- घनश्याम ओझा, पूर्व महापौर



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