जोधपुर. शहर की बदहाल सडक़ों का रोना आखिर किसके आगे रोएं। अफसर न आम लोगों की सुन रहे, ना हाईकोर्ट की चेतावनी। जनप्रतिनिधि शहर के सौंदर्यीकरण की बातों में व्यस्त हैं। कभी इंदौर और रायपुर जैसा न्यू जोधपुर बसाने कतो कभी किसी फव्वारे को ताजिकिस्तान जैसा बता लोगों को बहला देते हैं। जनता की मुसीबत को कोई नहीं समझ रहा। मानसून आया और चला गया। प्रदेश के कई इलाके पूरे चौमासे तर रहे। हमारे शहर के लोग आसमान ताकते रह गए। बरसाती सीजन में तीन या चार दिन ढंग की बरसात हुई और शहर की सडक़ों पर ऐसे जख्म छोड़ गई जो आज तक नहीं भरे। किसी इलाके में निकल जाइये, उधड़ी सडक़ें, आस-पास फैली गिट्टी के ढेर और गड्ढे स्थायी पहचान बन चुके हैं। कई स्थानों पर तो वाहन चलाना भी दुश्वार है। आवारा मवेशियों के कारण भी कई हादसे हो चुके हैं।
बनाड़ रोड इसका मुकम्मिल उदाहरण है। इधर रोज आने-जाने वालों से कोई पूछ के तो देखे, उनका दिल जानता है। सारण नगर से कालवी प्याऊ के बीच कई जगह इतने गड्ढे हैं कि दोपहिया वाहन सवार लोग या तो भगवान को याद करते हैं या उन लोगों को कोसते हैं जिन पर सडक़ों के रखरखाव की जिम्मेदारी है और जो आए दिन अखबारों में किसी नए आश्वासन या बहाने के साथ हाजिर रहते हैं। विरोध प्रदर्शन, ज्ञापन या आंदोलन की चेतावनी का भी उन पर असर नहीं होता। चार पहिया वाहन और मोटर साइकलें तो फिर भी कूदती-फांदती निकल जाती है। लेकिन स्कूली बच्चों और कामकाजी महिलाओं के लिए यह सडक़ पार करना किसी बुरे अनुभव ने कम नहीं है जो स्कूटी या एक्टिवा जैसे वाहनों से आती-जाती हैं।
यह समस्या बरसों से है और इसे सुधारने की मांग करने वालों ने संघर्ष समिति तक बना ली। कई बार जाम भी किया लेकिन समस्या जस की तस है। यह सडक़ एक उदाहरण भर है। मण्डोर क्षेत्र हो या चौपासनी हाउसिंग बोर्ड, कुड़ी, हालत कमोबेश ऐसी ही है। क्षतिग्रस्त सडक़ें सुधारने के लिए पिछले एक साल में करीब डेढ़ अरब रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। बावजूद इसके शहर में काम नहीं दिख रहा। जहां काम हो जाता है, वहां थोड़े दिन बाद फिर से सडक़ें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। यह हालत तब है जब क्षतिग्रस्त सडक़ें सुधारने के लिए एक साल में डेढ़ अरब रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। इसके बावजूद शहर में काम नहीं दिख रहा। जहां काम हो जाता है, वहां थोड़े दिन बाद फिर से सडक़ें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
आए दिन हादसे, शिक्षिका की मौत
सडक़ों की हालत के कारण शहर में आए दिन हादसे हो रहे हैं। गत अगस्त में मंडोर क्षेत्र में माता का थान रोड पर पुलिया के पास स्कूटी सवार शिक्षिका की मौत हो गई। जिस जगह एक्सीडेंट हुआ वहां डिवाइडर के पास बरसाती पानी जमा था। स्कूटी चला रही अरुणा ने पानी के पास से स्कूटी निकालने का प्रयास किया। इस दौरान पीछे से तेज रफ्तार में आ रहे ट्रक ने स्कूटी को टक्कर मार दी।
तब यह कहा था निगम और जेडीए आयुक्त ने
सडक़ पर गड्ढों से परेशान जनता को राहत देने के लिए नगर निगम और जोधपुर विकास प्राधिकरण आयुक्त दुर्गेश कुमार बिस्सा ने 13 अगस्त को दोनों निकायों की संयुक्त बैठक में अभियंताओं को सीवर लाइन डालने से क्षतिग्रस्त सडक़ों और वर्षाजनित गड्ढों को आपसी समन्वय से 15 दिन में सुधारने के निर्देश दिए थे। साथ ही इस काम में लापरवाही नहीं बरतने को भी चेताया था।
अब यह कहा
‘पत्रिका’ ने शनिवार को निगम और जेडीए आयुक्त से शहर की सडक़ों को 15 दिन में सुधारने के उनके वादे के बारे में पूछा। उनका कहना था कई जगह काम हो चुका है और कई जगह के लिए टेण्डर हो चुके हैं। शहर की सडक़ें जेडीए, नगर निगम, सार्वजनिक निर्माण विभाग और सीपीडब्लूडी के अधीन हैं। बनाड रोड सार्वजनिक निर्माण विभाग के एनएच विंग के तहत है। जेडीए के पास फण्ड की कमी नहीं है और निगम की आर्थिक हालत में भी सुधार हुआ है। बनाड रोड के बारे में उनका कहना था कि वे एक बार फिर इसे दिखवाएंगे और पूरी कोशिश होगी कि लोगों को शीघ्र राहत मिले।
हाईकोर्ट ने कहा था : ‘शहरों में आवारा पशु-गड्ढे दिखे तो अफसरों को जेल’
राजस्थान हाईकोर्ट ने गत 10 अगस्त को राजधानी सहित प्रदेश के विभिन्न शहरों में सडक़ों को आवारा पशुओं और गड्ढों से मुक्त करने के लिए तीन सप्ताह में सिस्टम विकसित करने और अब तक के आदेशों की पालना तुरंत कराने को कहा था। न्यायाधीश मनीष भण्डारी ने अदालती आदेशों की पालना में ढिलाई पर नाराजगी जाहिर करते हुए मौखिक टिप्पणी की थी कि पालना नहीं हुई तो अफसरों को जेल भेजने के अलावा कोई चारा नहीं है।
यहां हालत खस्ता
वीर दुर्गादास ओवरब्रिज के नीचे, खतरनाक पुलिया व चौपासनी रोड और मेहरानगढ़ रोड पर भी गड्ढे देखे जा सकते हैं। जबकि यहां से सर्वाधिक पर्यटक गुजरते हैं। परकोटे के भीतरी इलाकों में भी कई जगह हालात सही नहीं हैं।
अपने-पराये का भेद
नगर निगम ने बारिश के बाद महापौर घनश्याम ओझा, विधायक कैलाश भंसाली, जेडीए अध्यक्ष महेंद्रसिंह राठौड़, पार्षदों और सफाई निरक्षकों के घर के बाहर की सडक़ों की मरम्मत को प्राथमिकता दी। इनके आस-पास की क्षतिग्रस्त सडक़ों को ऐसे ही छोड़ दिया गया।
फैक्ट फाइल- एक साल में सडक़ पर हुआ खर्च
जोधपुर विकास प्राधिकरण : 40 करोड़ रुपए
नगर निगम: 20 करोड़ रुपए
पीडब्ल्यूडी: 20 करोड़ रुपए
यहां की सडक़ें सबसे बेहतर
रेजीडेंसी रोड : प्रशासनिक अधिकारियों के आवास हैं।
शास्त्रीनगर : शहर का सबसे पॉश इलाका। जनप्रतिनिधियों व प्रभावशाली लोगों के आवास हैं।
एयरपोर्ट रोड : वीआइपी का आवागमन।
हाईकोर्ट रोड : हाईकोर्ट, कलक्ट्रेट व अन्य कार्यालय।
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