चाय कि चुस्कियो के साथ उनसे बातों बातों मे जो ज्ञान(संस्कार)मिलता था आज के बच्चों को अत्याधुनिक विध्यालयो मे भी नही मिलता

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लघुकथा:-

कार्तिक मास के पुरे होतै दिन दिवाली के आने कि खुशी थी,और खेतों मे फसल कटाई का काम जोरों पर था।कुछ खेतों मे जहाँ बुआई देर से हुइ उनकी फसलें खड़ी थी जिन पर आवारा पशुऔ के आक्रमण का डर था।घर के सभी सदस्यगण दुसरे खेतों का काम निपटाने  मे व्यस्त होने के कारण खड़ी फसल वाले खेत कि निगरानी का जिम्मा मुझे मिला,विध्यालय से मिले गृहकार्य को खेत मे हि निगरानी के दौरान पुरा करने का निर्णय लिया और बस्ता(बैग)लेकर साईकिल से खेत पहुँच गया।खेजड़ी कि गहरी छाया मे अध्ययन का जो आनंद मिलता  था उसे तो आज आप वातानुकूलित कमरों मे भी महसूस नही कर सकते।दोपहर के 2 बजने का इशारा करती खेजड़ी कि छाया पड़ोस की ढाणी से बुढी दादी का मेरे लिए चाय लेकर आने का संदेश थी।चाय कि चुस्कियो के साथ उनसे बातों बातों मे जो ज्ञान(संस्कार)मिलता था आज के बच्चों को अत्याधुनिक विध्यालयो मे भी नही मिलता।  आज #पढ़ाई के लिए स्कूल का चयन लोग अपने औहदै का दिखावा करने के लिए करते है।
🙏🏻औमाराम मुन्दियाड़ा 🙏🏻

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