एक छोटी सी आत्मकथा

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सप्लीमेंट्री परीक्षा अर्थात पूरक परीक्षा, इसका नाम याद आते ही शरीर में एक भय नाम  की कंपकपी   छूटने  लगती है ।उस समय ऐसा लगने लगता है जैसे किसी भयंकर जाड़े की ठिठुरन भरी   सर्दी में हमारे पूरे शरीर में कपकपी छूट गई हो। सप्लीमेंट्री परीक्षा तो किसी विद्यार्थी के जीवन में एक  आफत रूपी के कांटे के समान  है ।सप्लीमेंट्री परीक्षा को 'आफत' की संज्ञा  देना गलत नहीं होगा क्योंकि यह आफत जिस किसी विद्यार्थी के गले पड़ती है उसके तो छक्के छूटना लगते हैं इसका पीछा छुड़ाना भी बहुत कठिन है ।किसी को तो यह अपने साथ अनुतीर्ण  रुपी समुंद्र में डुबो देती है। इस आफत रुपी  सप्लीमेंट्री परीक्षा का मैं यहां इसलिए वर्णन कर रहा हूं ,क्योंकि इस आफत ने  मेरे विद्यार्थी जीवन में भी एक बार प्रलय ला दिया था। जैसे ही मेरी 11 वीं की वार्षिक परीक्षा खत्म हुई ।उस समय से ही मुझे इस आफत के आने का निमंत्रण लगभग मिल चुका था ।हर समय मेरे मन में इस आफत का स्मरण आते ही कंपकपी  छूटने लगती थी। हर समय डर सा लगा रहता था ।किसी तरह 15 मई तक का दिन तो मैंने निकाल दिए। फिर मैं अपनी परीक्षा का परीक्षाफल परिणाम जानने जोधपुर आया।  मैं बड़े भारी और आशंकाएं से भरे हुए दिल के साथ स्कूल में पहुंचा। मेरा दिल बहुत  जोर-जोर से धड़क रहा था। किसी तरह स्कूल में पहुंचा, वहां पर मैंने अपने कक्षा अध्यापक से अपने परीक्षा फल के बारे में पूछा तो उन्होंने प्रगति पत्र (जो कि दूसरों के लिए प्रगति पत्र था लेकिन मेरे लिए तो आफत रूपी सप्लीमेंट्री परीक्षा का निमंत्रण पत्र) दिखाया । जब मैंने उस कार्ड को देखा तो उस समय मुझे लगा कि जैसे मेरे चारों ओर अंधेरा छा गया हो।  मुझे दिन में भी चारों और तारे दिखने लगे। किसी तरह मैं वहां से बाहर आया और महेश हॉस्टल गया ।वहाँ  मैंने अपने वार्डन को इस आफत के बारे में बताया तो उन्होंने मुझे आश्वासन दिया। जैसे किसी चोट ग्रस्त मरीज को डॉक्टर द्वारा भरोसा दिलाया जाता है कि वह जल्दी ठीक हो जाएगा।फिर मैं  वहां से अपने घर आया। वहां पर मैंने अपने मम्मी पापा को अपने परिणाम से अवगत कराया । इस स्थिति को बताते ही मेरी मम्मी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया है, लेकिन मेरे पापा शांत रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा क्योंकि  उन्हें तो पता है ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है। लेकिन  मेरी मम्मी अनपढ़ है उन्हें पता नहीं है कि यह बला होती क्या है? वह मेरे को डांटने लगी लेकिन मेरे पिताजी ने उन्हें समझाया। तब कहीं जाकर वह शांत हुई है उसके बाद तो मैं सबकी नजरों से लगभग गिर गया था। मैं हर समय किताब हाथ में रखता था ।ताकि  लगे की मैं पढ़ रहा हूं ।हर समय दिमाग में तनाव रहता था। हर समय दिल में ठेस रहती थी की किस्मत में मुझे ही क्यों झकड़ा, इस आफत ने। उसके बाद तो मुझे गांव में जाते समय भी शर्म आती थी ,कि कहीं कोई रिजल्ट के बारे में ना पूछ ले। जब भी कोई मुझे रिजल्ट के बारे में पूछता तो मैं उसे बहाना बना कर टरका  देता कि अभी मुझे मिला नहीं है ।और मेरे पिताजी जब एक दो आदमियों को बताया कि मेरे ग्यारवीं में सप्लीमेंट्री आ गई है तो किसी ने भी विश्वास नहीं किया। उन्होंने कहा ऐसा हो ही नहीं सकता मैं।अब मैं  हर समय घर में ही रहने लगा। उसके बाद तो सुबह 8:09 बजे उठने वाला है अतुल 5:00 बजे उठने लगा ।हर समय हंसी मजाक और गाने सुनने वाला अतूल गमगीन   सा रहने लगा।  जैसे मेरी रातों की नींद व्  चैन उड़ गया हो। उसके बाद जैसे ही जुलाई का महीना लगा मैं कृष्णा हॉस्टल में आ गया।  यहां पर कोई मुझे मेरे रिजल्ट के बारे में पूछता तो उस समय मेरी स्तिथि काटो तो खून नहीं जैसी हो जाती थी। किसी तरह परीक्षा से पहले इस आफत से छुटकारा पाने के लिए मैं फिर से स्कूल पहुंचा। वहां मैंने गणित और भौतिक विज्ञान के अध्यापक ,मतलब की इस आफत के जन्मदाता से मिला। वहां पर जब मैं गणित के सप्लीमेंट्री के जन्मदाता से मिला।तो मैंने उससे कहा कि सर मेरी कोई सहायता कीजिए ।तब बोले कि कुछ नहीं मेहनत करो "सफलता आपके कदम चूमेगी"। मेने कहा "यदि मेहनत करता तो आपके कदम चूमने" की जरूरत ही नहीं पड़ती है। जब उन्होंने मेरी इस आफत  से छुटकारा दिलाने से मना कर दिया तो मैंने एक तरकीब सोची ।उन्हें ट्यूशन रूपी प्रलोभन  दिया की मैं 12th में आपके पास ट्यूशन करूँगा। तो  वह मान गए और कहा कि उत्तर पुस्तिका खाली मत छोड़ना ।जो भी आए वह लिख देना। उसके बाद भौतिक विज्ञान के अध्यापक के पास गया तो उन्होंने भी  पहले तो मना कर दिया। लेकिन उन्हें भी ट्यूशन की ट्यूशन रूपी घूंटी पिलाई  तो एक छोटे बच्चे की मान गए ।उसके बाद मेरी परीक्षा नजदीक आ गई है ।मैं थोड़ी बहुत तैयारी करने लगा। परीक्षा की उस दिन तो मैं जल्दी ही उठाऔर तैयार हुआ। और  मैंने हनुमान जी को चार व्रत रखने का प्रलोभन दिया और हनुमान जी से कहा कि मुझे इस आफत से छुटकारा दिलाएं। फिर मैं स्कूल पहुंचा तो वहाँ मुझे मेरे जैसे 25 भाई और मिल गए। हमने सप्लीमेंट्री परीक्षा दी। और फिर मैं गणित के अध्यापक के पास ट्यूशन लेने लगा ताकि वो मेरे को इस आफत से छुटकारा दिला सके। उसके बाद उस आफत का परीक्षा परिणाम एक निश्चित तारीख को घोषित हुआ ।वहां मैं पहुंचा और परिणाम की लिस्ट देखी। जिसमे मैं उत्तीर्ण हो गया था। उस समय मुझे ऐसा लगा जैसे आसमान में खुशियां के बादल छाए हुए हो और खुशियां बसा रहे हो। मैंने वहां से तत्काल अपने पिताजी को फोन किया और बताया कि मैं इस आपस से छुटकारा पा चुका हूं। उसके बाद मैंने वहां से अपनी टीसी कटवा ली । गणित व् भौतिक विज्ञान के अध्यापक को बहुत बुरा लगा ।उनकी शक्ल उस दिन देखने लायक थी।उन्होंने सोचा होगा कि कुत्तिया तो गई ही साथ में गलबाणो भी ले गई।

                                                        अतुल
                                                17 अगस्त 2004

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