अकबर था महान या खुला शैतान

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अकबर था 'महान' या खुला शैतान ...??
अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है- “जब
भी कभी कोई रानी, दरबारियों की पत्नियाँ,
या नयी लडकियां शहंशाह की सेवा (यह साधारण
सेवा नहीं है) में जाना चाहती थी तो पहले उसे
अपना आवेदन पत्र हरम प्रबंधक के पास
भेजना पड़ता था. फिर यह पत्र महल के
अधिकारियों तक पहुँचता था और फिर जाकर उन्हें
हरम के अंदर जाने दिया जाता जहां वे एक महीने तक
रखी जाती थीं.”
अब यहाँ देखना चाहिए कि चाटुकार अबुल फजल
भी इस बात को छुपा नहीं सका कि अकबर अपने हरम
में दरबारियों, राजाओं और लड़कियों तक
को भी महीने के लिए रख लेता था.
पूरी प्रक्रिया को संवैधानिक बनाने के लिए इस धूर्त
चाटुकार ने चाल चली है कि स्त्रियाँ खुद अकबर
की सेवा में पत्र भेज कर जाती थीं! इस मूर्ख
को इतनी बुद्धि भी नहीं थी कि ऐसी कौन
सी स्त्री होगी जो पति के सामने ही खुल्लम
खुल्ला किसी और पुरुष की सेवा में जाने का आवेदन
पत्र दे दे?
मतलब यह है कि वास्तव में अकबर महान खुद ही आदेश
देकर जबरदस्ती किसी को भी अपने हरम में रख
लेता था और उनका सतीत्व नष्ट करता था.
यहाँ बकौल अकबरनामा भी यह गौर करना बहुत
महत्वपूर्ण है कि - रणथंभोर की संधि में अकबर महान
की पहली शर्त यह थी कि राजपूत
अपनी स्त्रियों की डोलियों को अकबर के
शाही हरम के लिए रवाना कर दें यदि वे अपने
सिपाही वापस चाहते हैं.
बैरम खान जो अकबर के पिता तुल्य और संरक्षक था,
उसकी हत्या करके इसने उसकी पत्नी अर्थात
अपनी माता के तुल्य स्त्री से शादी की.
ग्रीमन के अनुसार अकबर अपनी रखैलों को अपने
दरबारियों में बाँट देता था. औरतों को एक वस्तु
की तरह बांटना और खरीदना अकबर महान
बखूबी करता था.
मीना बाजार जो हर नए साल की पहली शाम
को लगता था, इसमें सब स्त्रियों को सज धज कर आने
के आदेश दिए जाते थे और फिर अकबर महान उनमें से
किसी को चुन लेते थे..!!
'नेक दिल' अकबर "महान" या जीताजागता मुसलोईड
शैतान ....??
6 नवम्बर 1556 को 14 साल की आयु में ही अकबर
'महान' पानीपत की लड़ाई में भाग ले रहा था, हिंदू
राजा हेमू की सेना मुग़ल सेना को खदेड़
रही थी कि अचानक हेमू को आँख में तीर लगा और वह
बेहोश हो गया, उसे मरा सोचकर उसकी सेना में भगदड़
मच गयी तब हेमू को बेहोशी की हालत में अकबर महान
के सामने लाया गया और इसने 'बहादुरी से' राजा हेमू
का सिर काट लिया और तब इसे गाजी के खिताब से
नवाजा गया. (गाजी की पदवी इस्लाम में उसे
मिलती है जिसने किसी काफिर को कतल
किया हो ऐसे गाजी को जन्नत नसीब होती है और
वहाँ सबसे सुन्दर हूरें इनके लिए बुक होती हैं). हेमू के सिर
को काबुल भिजा दिया गया एवं उसके धड
को दिल्ली के दरवाजे से
लटका दिया गया ताकि नए आतंकवादी बादशाह
की रहमदिली सब को पता चल सके...इतिहासकार उसे
आजाद भारत में भी महान बता सके..!!
इसके तुरंत बाद जब अकबर महान की सेना दिल्ली आई
तो कटे हुए काफिरों के सिरों से मीनार
बनायी गयी जो जीत के जश्न का प्रतीक है और यह
तरीका अकबर महान के पूर्वजों से ही चला आ रहा है.
हेमू के बूढ़े पिता को भी अकबर महान ने कटवा डाला.
और औरतों को उनकी सही जगह अर्थात शाही हरम में
भिजवा दिया गया.
अबुल फजल अकबरनामा में लिखता है कि खान जमन के
विद्रोह को दबाने के लिए उसके साथी मोहम्मद
मिराक को हथकडियां लगा कर हाथी के सामने
छोड़ दिया गया. हाथी ने उसे सूंड से उठाकर फैंक
दिया. ऐसा पांच दिनों तक चला और उसके बाद
उसको मार डाला गया.
चित्तौड़ पर कब्ज़ा करने के बाद अकबर महान ने तीस
हजार नागरिकों का क़त्ल करवाया.
अकबर ने मुजफ्फर शाह को हाथी से कुचलवाया.
हमजबान की जबान ही कटवा डाली. मसूद हुसैन
मिर्ज़ा की आँखें सीकर बंद कर दी गयीं. उसके 300
साथी उसके सामने लाये गए और उनके चेहरे पर गधों,
भेड़ों और कुत्तों की खालें डाल कर काट डाला गया.
विन्सेंट स्मिथ ने यह लिखा है कि अकबर महान
फांसी देना, सिर कटवाना, शरीर के अंग कटवाना,
आदि सजाएं भी देते थे.
2 सितम्बर 1573 के दिन अहमदाबाद में उसने 2000
दुश्मनों के सिर काटकर अब तक की सबसे
ऊंची सिरों की मीनार बनायी. वैसे इसके पहले सबसे
ऊंची मीनार बनाने का सौभाग्य भी अकबर महान के
दादा बाबर का ही था. अर्थात कीर्तिमान घर के
घर में ही रहा!
अकबरनामा के अनुसार जब बंगाल का दाउद खान
हारा, तो कटे सिरों के आठ मीनार बनाए गए थे. यह
फिर से एक नया कीर्तिमान था. जब दाउद खान ने
मरते समय पानी माँगा तो उसे जूतों में पानी पीने
को दिया गया...!!
थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु और पुरी के बीच
पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था. अकबर ने
आदेश दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने
वाला जगह पर कब्ज़ा कर ले. उन मूर्ख
आत्मघाती लोगों ने आपस में ही अस्त्र शस्त्रों से
लड़ाई शुरू कर दी. जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर
ने अपने सैनकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश
दिया. और अंत में इसने दोनों तरफ के
लोगों को ही अपने सैनिकों से मरवा डाला. और
फिर अकबर महान जोर से हंसा.
हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर
की नीति यही थी कि राजपूत ही राजपूतों के
विरोध में लड़ें. बादायुनी ने अकबर के सेनापति से बीच
युद्ध में पूछा कि प्रताप के राजपूतों को हमारी तरफ
से लड़ रहे राजपूतों से कैसे अलग पहचानेंगे? तब उसने
कहा कि इसकी जरूरत नहीं है
क्योंकि किसी भी हालत में मरेंगे तो राजपूत ही और
फायदा इस्लाम का होगा.
कर्नल टोड लिखते हैं कि अकबर ने एकलिंग
की मूर्ति तोड़ी और उस स्थान पर नमाज पढ़ी...!!
एक बार अकबर शाम के समय जल्दी सोकर उठ
गया तो उसने देखा कि एक नौकर उसके बिस्तर के
पास सो रहा है. इससे
उसको इतना गुस्सा आया कि नौकर को इस बात के
लिए एक मीनार से नीचे फिंकवा दिया.
अगस्त 1600 में अकबर की सेना ने असीरगढ़
का किला घेर लिया पर मामला बराबरी का था. न
तो वह किला तोड़ पाया और न ही किले
की सेना अकबर को हरा सकी. विन्सेंट स्मिथ ने
लिखा है कि अकबर ने एक अद्भुत तरीका सोचा. उसने
किले के राजा मीरां बहादुर को आमंत्रित किया और
अपने सिर की कसम खाई कि उसे सुरक्षित वापस जाने
देगा. तब मीरां बहादुर शान्ति के नाम पर बाहर
आया और अकबर के सामने सम्मान दिखाने के लिए
तीन बार झुका पर अचानक उसे जमीन पर
धक्का दिया गया ताकि वह पूरा लेटकर (दण्डवत
होकर ही ) सजदा कर सके क्योंकि अकबर महान
को यही पसंद था...उसको अब पकड़ लिया गया और
आज्ञा दी गयी कि अपने सेनापति को कहकर
आत्मसमर्पण करवा दे ,सेनापति ने मानने से मना कर
दिया और अपने लड़के को अकबर के पास यह पूछने
भेजा कि उसने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी.?
तब ऐतिहासिक अकबर 'महान' ने बच्चे से
पूछा कि क्या तेरा पिता आत्मसमर्पण के लिए तैयार
है? तब बालक ने कहा कि उसका पिता समर्पण
नहीं करेगा चाहे राजा को मार ही क्यों न
डाला जाए. यह सुनकर अकबर महान ने उस बालक
को मार डालने का आदेश दिया. इस तरह झूठ के बल पर
अकबर महान ने यह किला जीता.
यहाँ ध्यान देना चाहिए कि यह घटना अकबर की मृत्यु
से पांच साल पहले की ही है. अतः कई लोगों का यह
कहना कि अकबर बाद में बदल गया था, एक झूठ बात
है.
इसी तरह अपने ताकत के नशे में चूर अकबर ने बुंदेलखंड
की प्रतिष्ठित रानी दुर्गावती से लड़ाई की और
लोगों का क़त्ल किया...!!
ऐसे इतिहासकार जिनका अकबर दुलारा और चहेता है,
एक बात नहीं बताते कि कैसे एक ही समय पर
राणा प्रताप और अकबर महान हो सकते थे
जबकि दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी थे...?
यहाँ तक कि विन्सेंट स्मिथ जैसे अकबर
प्रेमी को भी यह बात माननी पड़ी कि चित्तौड़ पर
हमले के पीछे केवल उसकी सब कुछ जीतने की हवस
ही काम कर रही थी. वहीँ दूसरी तरफ
महाराणा प्रताप अपने देश के लिए लड़ रहे थे और
कोशिश की कि राजपूतों की इज्जत
उनकी स्त्रियां मुगलों के हरम में न जा सकें. शायद
इसी लिए अकबर प्रेमी जलील भारतीय
'इतिहासकारों' ने राणा को लड़ाकू और अकबर
को देश निर्माता 'महान' के खिताब से नवाजा है..!!
अकबर महान अगर, राणा शैतान तो
शूकर है राजा, नहीं शेर वनराज है
अकबर आबाद और राणा बर्बाद है तो
हिजड़ों की झोली पुत्र, पौरुष बेकार है
अकबर महाबली और राणा बलहीन तो
कुत्ता चढ़ा है जैसे मस्तक गजराज है
अकबर सम्राट, राणा छिपता भयभीत तो
हिरण सोचे, सिंह दल उसका शिकार है
अकबर निर्माता, देश भारत है उसकी देन
कहना यह जिनका शत बार धिक्कार है
अकबर है प्यारा जिसे राणा स्वीकार नहीं
रगों में पिता का जैसे खून अस्वीकार है...!!
हिन्दुस्तानी मुसलमानों को यह कह कर बेवकूफ
बनाया जाता है कि अकबर ने इस्लाम
की अच्छाइयों को पेश किया. असलियत यह है
कि कुरआन के खिलाफ जाकर 36 शादियाँ करना,
शराब पीना, नशा करना, दूसरों से अपने आगे
सजदा करवाना आदि करके भी इस्लाम को अपने
दामन से बाँधे रखा ताकि राजनैतिक फायदा मिल
सके. और सबसे मजेदार बात यह है कि वंदे मातरम में
शिर्क दिखाने वाले मुल्ला मौलवी अकबर की शराब,
अफीम, 36 बीवियों, और अपने लिए करवाए सजदों में
भी इस्लाम को महफूज़ पाते हैं,, किसी मौलवी ने
आज तक यह फतवा नहीं दिया कि अकबर या बाबर
जैसे शराबी और समलैंगिक मुशरिक मुसलमान नहीं हैं
और इनके नाम की मस्जिद हराम है...!!
अकबर ने खुद को दिव्य आदमी के रूप में पेश किया. उसने
लोगों को आदेश दिए कि आपस में “अल्लाह ओ अकबर”
कह कर अभिवादन किया जाए. भोले भाले मुसलमान
सोचते हैं कि वे यह कह कर अल्लाह को बड़ा बता रहे हैं
पर अकबर ने अल्लाह के साथ अपना नाम जोड़कर
अपनी दिव्यता फैलानी चाही. अबुल फज़ल के अनुसार
अकबर खुद को सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) की तरह
पेश करता था. ऐसा ही इसके लड़के जहांगीर ने
लिखा है.
अकबर ने अपना नया पंथ दीन ए
इलाही चलाया जिसका केवल एक मकसद खुद
की बडाई करवाना था. उसके चाटुकारों ने इस
धूर्तता को भी उसकी उदारता की तरह पेश किया!
अकबर को इतना महान बताए जाने का एक कारण
ईसाई इतिहासकारों का यह था कि क्योंकि इसने
हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों का ही जम कर अपमान
किया और इस तरह भारत में अंग्रेजों के इसाईयत फैलाने
के उद्देश्य में बड़ा कारण बना. विन्सेंट स्मिथ ने भी इस
विषय पर अपनी राय दी है.
जलालुद्दीन नसीरूद्दीन अकबर 'महान' भाषा बोलने में
बड़ा चतुर था. विन्सेंट स्मिथ लिखता है
कि मीठी भाषा के अलावा उसकी सबसे
बड़ी खूबी अपने जीवन में दिखाई बर्बरता है!
अकबर ने अपने को रूहानी ताकतों से भरपूर साबित
करने के लिए कितने ही झूठ बोले. जैसे कि उसके
पैरों की धुलाई करने से निकले गंदे पानी में अद्भुत
ताकत है जो रोगों का इलाज कर सकता है. ये वैसे
ही दावे हैं जैसे मुहम्मद साहब के बारे में हदीसों में किये
गए हैं. अकबर के पैरों का पानी लेने के लिए
लोगों की भीड़ लगवाई जाती थी. उसके
दरबारियों को तो यह अकबर के नापाक पैर
का चरणामृत पीना पड़ता था ताकि वह नाराज न
हो जाए...!!
अकबर 'महान' के नवरत्नों में से एक बुद्धिमान बीरबल
शर्मनाक तरीके से एक लड़ाई में मारा गया. बीरबल
अकबर के किस्से असल में मन बहलाव की बातें हैं
जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं. ध्यान रहे
कि ऐसी कहानियाँ दक्षिण भारत में तेनालीराम के
नाम से भी प्रचलित हैं...!!
नवरत्नों में से एक और मान सिंह जो देश में पैदा हुआ
सबसे नीच गद्दार था, ने अपनी बहन जहांगीर को दी.
और बाद में इसी जहांगीर ने मान सिंह
की पोती को भी अपने हरम में खींच लिया.
यही मानसिंह अकबर के आदेश पर जहर देकर मार
डाला गया और इसके पिता भगवान दास ने
आत्महत्या कर ली... इन नवरत्नों को अपनी बीवियां,
लडकियां, बहनें तो अकबर की खिदमत में
भेजनी पड़ती ही थीं ताकि बादशाह सलामत
उनको भी सलामत रखें. और साथ ही अकबर महान के
पैरों पर
डाला गया पानी भी इनको पीना पड़ता था जैसा कि ऊपर
बताया गया है.
एक और नवरत्नी रत्न राजा टोडरमल अकबर
का वफादार खजांची और धनसंग्राहक अकाऊंटेंट
था तो भी उसकी पूजा की मूर्तियां अकबर ने
तुडवा दीं. इससे टोडरमल को दुःख हुआ और इसने
इस्तीफ़ा दे दिया और वाराणसी चला गया.
अगले रत्न शाह मंसूर दूसरे रत्न अबुल फजल के हाथों सबसे
बड़े रत्न अकबर के आदेश पर मार डाले गए ..!
अकबर ने एक ईसाई पुजारी को एक रूसी गुलाम
का पूरा परिवार भेंट में दिया. इससे पता चलता है
कि अकबर गुलाम रखता था और उन्हें वस्तु की तरह भेंट
में दिया और लिया करता था... !!
अकबर ने प्रयागराज (जिसे बाद में इसी धर्म निरपेक्ष
महात्मा ने इलाहबाद नाम दिया था) में गंगा के
तटों पर रहने वाली सारी आबादी का क़त्ल
करवा दिया और सब इमारतें गिरा दीं क्योंकि जब
उसने इस शहर को जीता तो लोग उसके इस्तकबाल करने
की जगह घरों में छिप गए. यही कारण है
कि प्रयागराज के तटों पर कोई पुरानी इमारत
नहीं है.
एक बहुत बड़ा झूठ यह है कि फतेहपुर सीकरी अकबर ने
बनवाया था. इसका कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है.
बाकी दरिंदे लुटेरों की तरह इसने भी पहले सीकरी पर
आक्रमण किया और फिर प्रचारित कर दिया कि यह
मेरा है. इसी तरह इसके पोते और इसी की तरह दरिंदे
शाहजहाँ ने यह ढोल पिटवाया था कि ताज महल
इसने बनवाया है वह भी अपनी चौथी पत्नी की याद
में जो इसके और अपने सत्रहवें बच्चे को पैदा करने के
समय चल बसी थी!
तो ये कुछ उदाहरण थे अकबर “महान” के जीवन से
ताकि आपको पता चले कि हमारे नपुंसक
इतिहासकारों की नजरों में महान बनना क्यों हर
किसी के बस की बात नहीं. क्या इतिहासकार और
क्या फिल्मकार और क्या कलाकार, सब एक से एक
मक्कार, देशद्रोही, कुल कलंक, नपुंसक हैं जिन्हें फिल्म
बनाते हुए अकबर तो दीखता है पर महाराणा प्रताप
कहीं नहीं दिखता....!!
Note : यहां सभी तथ्य अबुल फजल लिखित आईन ऐ
अकबरी (अकबरनामा) तथा हिंदू महासभा की साईट
व अन्य जगहों से सीधे संकलित व संपादित कर प्रस्तुत
किये गये है और यह कतई मेरा पूरा लेखन नहीं हैॆ, बस मैनें
संकलन संपादन मात्र कर अपने 3 हजार से
ज्यादा मित्रों की मित्र सूची को जरिया बना कर
सही इतिहास और भारत के असली रणनायकों व हिंदू
नायकों की बहादुरी भरी वास्तविकता तथा मुसलोईड
अकबर शैतान की असलियत को एक विस्तृत, वृहदतम
मंच प्रदान करने की कोशिश मात्र की है ..!!
उपरोक्त लिखित सब ऐतिहासिक तथ्य हैं और
किसी मुसलोईड नौकर सरीखे सेक्यूलर
या ऐतिहासिक जीव को किसी भी तरह का शक
शुबहा हो ,बहस करनी हो तो जरिया ऐ पोस्ट सीधे
"जिल्लेइल़ाही" से बात ऐ बहस कर ही ले..!!
वन्दे मातरम्

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