कांग्रेसियों का कहना है कि नटवर सिंह 'निजी स्वार्थ' के लिए पार्टी की बातें सार्वजनिक कर रहे हैं। सही बात है उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। अगर सोनिया गांधी ने राहुल को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया तो इसलिए नहीं कि राहुल उनका बेटा था, बल्कि इसलिए कि इस पद के लिए खुद को योग्य साबित करने के लिए राहुल बाबा ने UPSC की परीक्षा पास की थी।
अगर मनमोहन सिंह राहुल बाबा द्वारा कैबिनेट के फैसले को सरेआम बकवास कहने की ज़ल्लात झेल गए तो इसलिए नहीं कि इसमें उनका प्रधानमंत्री बने रहने का 'निजी स्वार्थ' था बल्कि इसलिए कि उसी रात ब्रह्मा जी सपने में आकर उन्हें बताया कि बेटा, कैबिनेट का फैसला वाकई बकवास था।
हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने रॉबर्ट वाड्रा जैसे एक साधारण व्यवसायी को लैंड यूज़ बदलकर करोड़ों की ज़मीन कौड़ियों के भाव इसलिए नहीं दे दी क्योंकि वो सोनिया गांधी के दामाद थे बल्कि इसलिए दी, क्योंकि रॉबर्ट वाड्रा उसमें 'आदिवासी कन्या छात्रावास' खोलने वाले थे।
बिहार, यूपी, दिल्ली के विधानसभा चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों में पार्टी की लुटिया डूबोने के बावजूद अगर सिब्बल और मनीष तिवारी जैसों को आज भी राहुल गांधी में कुशल नेतृत्व दिखता है तो इसलिए नहीं कि उनके ज़हन में भविष्य में मंत्री बने रहने का निजी स्वार्थ है, बल्कि इसलिए कि सैंकड़ों साल पहले नास्त्रेदमस भविष्यवाणी कर गया था कि 21वीं सदी में भारत का नेतृत्व खिचड़ी दाढ़ी वाला 50 साल का युवा अविवाहित नेता करेगा।
इसलिए नटवर सिंह को भी बाकी कांग्रेसियों की तरह ‘निजी स्वार्थ’ से ऊपर उठकर ‘पार्टी हित’ के बारे में सोचना चाहिए था। और यहां ‘पार्टी हित’ का मतबल ख़ास परिवार और उनके चाटुकारों के पार्टी करते रहने से है।

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