जोधपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने एक याचिका को स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की है कि किसी कर्मचारी को अनिश्चित काल तक जैसलमेर और बाड़मेर जैसे क्षेत्रों में सेवा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो कि काफी कठिन क्षेत्र है।
न्यायाधीश दिनेश मेहता की एकल पीठ में याचिकाकर्ता राजेश की ओर से अधिवक्ता रामदेव पोटलिया ने कहा कि याचिकाकर्ता की शिक्षक पद पर 2007 में जैसलमेर जिले में नियुक्ति हुई थी। वर्ष 2018 के परिपत्र के अनुसार वह अपने गृह जिले झुंझुनू में स्थानांतरण की पात्र है, क्योंकि उसकी नियुक्ति 2008 से पहले की है। याचिकाकर्ता लंबे अरसे से अपनी सास और बच्चों की देखभाल के लिए जैसलमेर से तबादले की मांग कर रही है, लेकिन उसकी मांग अनसुनी की जाती रही। इस बीच, उसके पति का भी निधन हो चुका है। राज्य की ओर से यह दलील दी गई कि चूंकि बाड़मेर-जैसलमेर प्रतिबंधित जिलों की श्रेणी में आते हैं, लिहाजा याचिकाकर्ता का अन्य मुक्त जिले में तबादला नहीं किया जा सकता। इसे गंभीरता से लेते हुए एकल पीठ ने कहा कि कुछ जिलों को प्रतिबंधित श्रेणी में रखते हुए अन्य को खुला रखकर काल्पनिक प्रतिबंधित क्षेत्र बनाने की राज्य सरकार की कार्यवाही मनमानी और भेदभावपूर्ण है।
सुशासन के मूल सिद्धांतों के खिलाफ
इस कोर्ट की राय में किसी कर्मचारी को अनिश्चित काल तक जैसलमेर और बाड़मेर जैसे क्षेत्रों में सेवा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, जो काफी कठिन क्षेत्र हैं। इस आशय का प्रतिबंध लगाना कि ऐसे क्षेत्र में तैनात किसी शिक्षक का स्थानांतरण नहीं किया जाएगा, अपने आप में अवैध, अविवेकपूर्ण और सुशासन के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। राज्य सरकार का दृष्टिकोण याचिकाकर्ता जैसे कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, जो राज्य की सेवा करने के लिए पिछले 16 सालों से अपने घर से 700 किलोमीटर दूर रह रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक शिक्षा निदेशक ने याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन को लापरवाही निस्तारित किया है और उन्होंने 2018 के परिपत्र को देखा भी नहीं है। यह गंभीर चिंता का विषय है।
चार सप्ताह में पदस्थापन देने के निर्देश
पीठ ने शिक्षा निदेशक की उदासीनता को रेखांकित करते हुए कहा कि उनका याची का अभ्यावेदन निस्तारित करते हुए यह लिखना कि परिपत्र स्थानांतरण का कोई अधिकार प्रदान नहीं करता और गृहनगर से 700 किलोमीटर की दूरी स्थानांतरण का आधार नहीं है, घाव पर नमक छिड़कने से कम नहीं है। पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को गृह जिले में चार सप्ताह में पदस्थापन देने के निर्देश दिए हैं। साथ ही राज्य सरकार पर दस हजार रुपए की कॉस्ट लगाई गई है, जिसे सरकार शिक्षा निदेशक से वसूलने के लिए स्वतंत्र होगी। यह कॉस्ट याचिकाकर्ता को देने को कहा गया है।
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