जोधपुर. मान लीजिए आप कोल्ड ड्रिंक की बोतल का ढक्कन खोलें और उसमें बुलबुले ही न उठें तो कैसा लगेगा? दरअसल, यह बुलबले गोंद अरेबिक की वजह से उठते हैं। इन दिनों दुनिया भर में कार्बोनेटेड शीतल पेय कम्पनियों के सामने बुलबुलों को बनाए रखने का संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि अफ्रीकी देश सूडान में गृहयुद्ध के कारण गोंद अरेबिक की आपूर्ति बंद हो गई है। जानकारों का कहना है कि गोंद अरेबिक खाद्य सामग्री के साथ सौंदर्य और औषधि में भी काम आता है।
इस समस्या के समाधान के लिए केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) की कुमट से गोंद प्राप्त करने की विकसित की गई तकनीक कारगर होगी। कुमट के एक वृक्ष से पहले जहां 50 ग्राम तक गोंद मिलता था, अब 200 से 500 ग्राम प्राप्त हो रहा है। कुमट के वृक्ष राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और हरियाणा में बहुतायत में है।
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यह है कुमट से गोंद प्राप्ति की तकनीक:
काजरी के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. पीआर मेघवाल और वरिष्ठ वैज्ञानिक अर्चना वर्मा ने बताया कि इस तकनीक में कुमट पेड़ के तने में 1.5 सेमी व्यास व 5 सेमी गहराई का एक तिरछा छिद्र किया जाता है। इसमें निश्चित सांद्रता वाला गोंद उत्प्रेरक इथोफोन इंजेक्शन 4 एमएल डालकर छिद्र को चिकनी मिट्टी से बंद कर देते हैं। कुछ ही दिनों में ही पेड़ के विभिन्न भागों से गोंद निकलना शुरू हो जाता है। इसके एक माह बाद सूखे गोंद का इकट्ठा कर लिया जाता है। बाजार में इसकी कीमत 1000 से 1500 रुपए प्रति किलो है। इंजेक्शन केवल बीस रुपए का है। कुमट के पेड़ से प्राप्त गोंद अरेबिक। इधर पेड़ पर सूखा हुआ गोंद अरेबिक।
काजरी गोंद उत्पादन तकनीक से गोंद अरेबिक का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, जिससे अभी हो रहे आयात को कम कर बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की बचत की जा सकती है।- डॉ. ओपी यादव, निदेशक, काजरी जोधपुर
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70 फीसदी गोंद सहारा रेगिस्तान से
दुनियाभर में 70 फीसदी गोंद की आपूर्ति सहारा रेगिस्तान यानी अफ्रीका की साहेल पट्टी से होती है, जिसमें सूड़ान के अलावा नाइजर, चाड, नाइजीरिया, माली व मॉरिटाआना देश शामिल है। इसे गोंद पट्टी भी कहते हैं।
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