महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी ई-रिक्शा चालक रूपा, देखें Video...

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जयकुमार भाटी/जोधपुर. विलक्षणताओं का देश कहलाने वाले भारत की नारी भी किसी से कम नहीं हैं। भारतीय नारी ने हमेशा अपने आदर्श का संरक्षण किया है। आज महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर देश की प्रगति में भागीदार बन रही हैं। कहते है कि अक्सर महिलाएं वही काम करती है, जो आसान हो, लेकिन जोधपुर की एक महिला ने वह कर दिखाया जो आम महिलाएं करने से कतराती है। ऐसी ही एक महिला है जो शहर की सड़कों पर ई रिक्शा चलाकर महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। ये है चार बच्चों की मां रूपा प्रजापत जो शहर की गलियों में ई रिक्शा में सब्जी बेचते नजर आती है। रूपा ई रिक्शा के माध्यम से फैक्ट्री में ठेकेदार पति पुखराज प्रजापत का सहयोग करते हुए अपने चार बच्चों का भरण-पोषण कर रही हैं। रूपा का कहना है कि हर महिला को आत्मनिर्भर बनना चाहिए। महिलाएं अब किसी पर आश्रित नहीं हैं। वे भी अपना स्वरोजगार कर सकती हैं।

ऐसे हुई ई रिक्शा चलाने की शुरुआत
रूपा ने बताया कि घर से करीब 25 किलोमीटर दूर भदवासिया सब्जी मंडी सिटीबस से सब्जी लेने आती थी। उस समय मैंने घर में सब्जी की दुकान लगा रखी थी। कोरोना काल में जब दुकान बंद हुई तो मैंने पति के सहयोग से ई रिक्शा लेने की ठानी। उस समय घरवालों ने एक बार तो विरोध किया कि आपने कभी साईकिल भी नहीं चलाई तो ई रिक्शा कैसे चला पाओगे। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और ई रिक्शा ले लिया। मैं कोरोना काल में भी ई रिक्शा से गलियों में घूम-घूम कर सब्जी बेचा करती थी।

प्रतिदिन सौ किलोमीटर का तय करती सफर
रूपा ने बताया कि सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक मैं ई रिक्शा से सब्जी बेचने का काम करती हूँ। मैं भदवासिया मंडी से सब्जी खरीदने के बाद पावटा स्थित होटल व भोजनालय में सब्जी देते हुए रोटरी चौराहे, एम्स रोड, बासनी, सांगरिया व तनावड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों की गली मोहल्ले में घूम कर सब्जी बेचती हूँ। ऐसे में फिक्स ग्राहकों की ओर से मुझे सब्जी की लिस्ट उपलब्ध करवाई जाती है। जिससे उनके लिए सब्जी लेने में भी आसानी रहती है।

शौक बन गया रोजगार
मुझे सबसे पहले मेरे एक परिचित ने ई रिक्शा चलाने को कहा। मैंने करीब एक किलोमीटर तक चलाया। उस समय मेरे हाथ कॉप रहे थे। मुझे डर लग रहा था। फिर मैंने हिम्मत जुटाई और दस दिन में ई रिक्शा चलाना सीखा। रूपा ने बताया कि ई रिक्शा चलाना मेरी कोई मजबूरी नहीं है, बस शौक होने से पति ने भी साथ दिया। आज मैं और मेरे पति अपने चारों बच्चों (मनीषा, वर्षा, कन्हैयालाल व किशन) का भविष्य संवारने में जुटे हुए है। रूपा कहती है कि महिलाओं को जिंदगी में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। आज के जमाने में महिलाएं किसी से कम नही हैं। अपनी मेहनत और लग्न से महिलाएं कुछ भी कर सकती हैं।



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