सिकन्दर पारीक
जोधपुर। झुंझुनूं का मेहुल सिंह। बारिश में भीगते दिव्यांग को देखकर ऐसा छाता बनाया, जिसमें बैसाखी भी है। रात में टॉर्च के साथ बैसाखी में मोबाइल रखने की जगह भी दी। हनुमानगढ़ की आफरीन ने कोल्ड ड्रिंक की प्लास्टिक की खाली बोतलों से रस्सी बना डाली। दोनों के मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर चुने गए।
मेहुल और ऑफरीन जैसे सैकड़ों बाल वैज्ञानिक अब शहरों की बजाय गांव-कस्बों में तैयार हो रहे हैं। सामने दिख रही परेशानियों, अभावों से रू-ब-रू होते-होते खोज रहे हैं विज्ञान के जरिए समाधान का तरीका। बीते कुछ सालों से गांव-कस्बे के बाल वैज्ञानिक यह कहावत साबित करने में जुटे हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। गत तीन वर्षों में राजस्थान से 351808 मॉडल प्रवृष्टियां मिली, इनमें से 20069 को दस-दस हजार रुपए का इंस्पायर अवार्ड दिया गया। खास बात यह कि भरतपुर, चित्तौडगढ़़, बाड़मेर, झुंझुनूं, सीकर, चूरू, पाली, नागौर व श्रीगंगानगर जैसे जिलों के बाल वैज्ञानिक बड़े शहरों से आगे निकल रहे हैं।
पूरे देश में गांवों का डंका
देश भर में गत तीन वर्षों में इंस्पायर अवार्ड के लिए 147884 प्रवृष्टियां चयनित हुई, जिनमें से 114224 ग्रामीण इलाकों से है। वर्ष 2021-22 में अलवर के 620,झुंझुनूं 561, चित्तौडगढ़़ 502, चूरू 430 मॉडल चुने गए। राजधानी जयपुर का 993 का आंकड़ा छोड़ दे तो चयन का आंकड़ा अजमेर में 277, उदयपुर 394, जोधपुर 395 व कोटा में 410 ही रहा है।
इनका कहना है
आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है, इसे ग्रामीण इलाकों के बच्चे साबित कर रहे हैं। पूरे देश में गत वर्ष जोधपुर का 32वां स्थान था, इस बार आठवां है। ग्रामीण इलाकों के बाल वैज्ञानिक ज्यादा हैं।
अमृतलाल, जिला शिक्षाधिकारी (माध्यमिक), जोधपुर
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