जोधपुर. जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्र विभाग के शोधकत्र्ताओं ने मरुस्थलीय फसल बाजरे में प्रोटिओमिक्स पद्धति से नए सॉल्ट टॉलरेंस (लवण सहिष्णु) जीन खोजे गए हैं। इन जीन को देश में होने वाली अन्य संवेदनशील फसलों में जेनेटिक इंजीनियरिंग व जिनोम एडिटिंग से प्रवेश करवाकर उन फसलों को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से बचाया जा सकेगा। इससे फसल उत्पादन बढ़ेगा और किसानों की आय भी बढ़ेगी। बाजरा पहले से ही सॉल्ट टॉलरेंस हैं। गेहूं का टॉलरेंस भी ठीक ठाक है लेकिन चावल जैसी कुछ फसलें संवेदनशील होती हैं। ऐसे में मरुस्थलीय पादपों को ये जीन गंगा-यमुना के मैदान और गोदावरी-कृष्णा के मैदान में होने वाली फसलों को बचाने में कारगर सिद्ध हो सकेगा। शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल फिजियोलॉजिया प्लांटेरम (प्रकाशक-विले) ने प्रकाशित करने की स्वीकृति दी है।
वनस्पति विभाग में बनाई अत्याधुनिक लैब
विज्ञान एवं प्रौद्योगिक विभाग अनुदानित इस प्रोजेक्ट के लिए जेएनवीयू के वनस्पति शास्त्र विभाग में आधुनिक मॉड्यूलर लैब विकसित की गई। शोध कार्य के लिए अति आवश्यक जटिल व मूल्यवान मास स्पेक्ट्रोमेट्री फैसिलिटी के लिए आइआइटी रुडक़ी के साथ कोलेबोरेशन किया गया। बाजरे के विभिन्न जर्मप्लाज्म एनबीपीजीआर जोधपुर और इक्रीसेट हैदराबाद से प्राप्त किए गए।
बाजरे के 33 जर्मप्लाज्म से ढूंढे जीन
शोध की मुख्य अन्वेषक व विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ श्वेता झा ने बाजरे के 33 जीनोटाइप से स्क्रीनिंग के बाद सॉल्ट टॉलरेंस वाले प्रोटींस और साल्ट स्ट्रेस- एडपटिव मोलेक्युलर मैकेनिज्म की पहचान की। बाजरे के सभी जीनोटाइप को लवण वाले कृत्रिम हाइड्रोपोनिक्स सिस्टम में उगाया गया। स्क्रीनिंग व फिजियो बायोकेमिकल केरेक्टराइजेशन के बाद चयनित विषम गुणों वाले जीनोटाइप (आईसी-325825 साल्ट टॉलरेंट व आईपी-17224 साल्ट सेंसिटिव) में आधुनिकतम प्रोटियोमिक्स तकनीक से स्ट्रेस कंडीशन में विशिष्ट रूप से व्यक्त प्रोटींस की पहचान की गई।
इसलिए चुना बाजरा
केंद्र सरकार ने मिलेट मिशन (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन मिशन के अंतर्गत) के तहत वर्ष 2018 को बाजरा वर्ष घोषित किया। अब संयुक्त राष्ट्र के कृषि एवं खाद्य संगठन की ओर से 2023 को अंतरराष्ट्रीय वर्ष मनाया जाएगा। बाजरे के भरपूर उपयोग को देखते हुए शोध के लिए इसका चयन किया गया।
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‘बाजरा पोषक तत्वों से भरपूर व विषम शुष्क वातावरण के लिए अनुकूलित है लेकिन अभी तक इसका आण्विक स्तर पर केरेक्टराइजेशन नहीं किया गया था। नए शोध से मिले सॉल्ट टॉलरेंस जीन को अन्य फसलों में प्रवेश करवाकर उन्हें विषम मौसमीय व जलवायु परिस्थितियों से बचाया जा सकेगा।’
-डॉ श्वेता झा, असिस्टेंट प्रोफेसर, वनस्पति विज्ञान विभाग, जेएनवीयू जोधपुर
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