जोधपुर। जोधाणा के सपूत मेजर शैतानसिंह की शौर्य गाथा से आज भी चीन की रूह कांपती है। साल 1962 के भारत-चीन युद्ध में उसे ऐसी मार पड़ी थी कि रेजांग-ला दर्रे के रास्ते लद्दाख में घुसने की हिम्मत वह आज भी नहीं जुटा पा रहा।
चुशूल सेक्टर की लड़ाई में 18 नवम्बर 1962 को परमवीर मेजर शैतानसिंह भाटी के नेतृत्व वाली भारतीय सेना की 13-कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कम्पनी के 114 सैनिकों ने शहादत देकर न सिर्फ चीन की सेना को लद्दाख में घुसने से रोक दिया, बल्कि दुश्मन के लगभग दो हजार सैनिकों को मौत के घाट भी उतार दिया। मेजर शैतानसिंह और उनकी कम्पनी के जवानों के शव लगभग तीन महीने बाद मिले, तब भी उनके हाथों में मौजूद संगीनें अदम्य साहस की कहानी कह रही थी। उस लड़ाई की कहानी आज भी भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दमक रही है। चुशूल सेक्टर के युद्ध को रेखांकित करती कवि प्रदीप के अमर गीत की पंक्तियां-
दस दस को एक ने मारा/फिर गिर गए होश गंवा के/जब अंत समय आया तो.../कह गए कि हम चलते हैं/ खुश रहना देश के प्यारों, अब हम को सफर करते हैं... आज भी युद्ध की याद दिलाते हुए रोंगटे खड़े कर देती है।
थ्री नॉट थ्री के सामने मशीनगन
चुशूल सेक्टर में चीनी सेना को सिर्फ शैतानसिंह का साहस ही रोक सकता था। उनकी चार्ली कम्पनी को टास्क दिया गया था चीन को रेजांग-ला दर्रे में घुसने से रोकना। बर्फीली इलाके में लडऩे से अनजान मात्र 120 सैनिक, हाथों में थ्री नॉट थ्री राइफल्स, मात्र तीन-चार सौ गोलियां, कुछ हथगोले और सामने करीब दुश्मन के दो हजार दुश्मन सैनिक अनगिनत मोर्टार, मशीनगन और अत्याधुनिक हथियारों के साथ। फिर भी चार्ली कम्पनी ने एक गोली एक दुश्मन के कौशल के साथ मुकाबला किया और चीनी फौज को आगे बढऩे से रोक दिया। खुद शैतानसिंह एक चौकी से दूसरी चौकी तक जवानों की हौंसला अफजाई करते हुए गम्भीर रूप से जख्मी हुए, लेकिन मोर्चा नहीं छोड़ा। नतीजन चीन पीछे हटा और युद्धविराम का झंडा उठा दिया। महज 37 साल की उम्र में शहीद हुए शैतानसिंह की यह शौर्यगाथा आज भी दुश्मन का दिल दहला देती है। उनके अदम्य साहस को वीरता के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र के साथ सलाम किया गया। आज मेजर शैतानसिंह की बलिदान दिवस है। उन्हें शत शत नमन।
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