सिकन्दर पारीक
जोधपुर. सहकारिता की कीमत समझ केन्द्र सरकार ने नए मंत्रालय का गठन कर अगले वर्ष नई सहकार नीति का निर्णय किया है, लेकिन प्रदेश में सहकारिता का ढर्रा पुरानी चाल चल रहा है। पिछले 117 वर्षों में सहकार से समृद्धि का शोर तो खूब सुनाई दिया लेकिन पूरा तंत्र अंदर तक खोखला सा है।
तकरीबन हर जिले में गड़बडिय़ों की गठरियां भरी पड़ी है। समितियों के न चुनाव हो रहे हैं और ना ही पूरी ऑडिट। अधिकांश जगह नेताओं ने सहकारिता को राजनीति चमकाने का जरिया बना लिया है। गांवों में व्यवस्थापक पीढी-दर-पीढी चल रहे हैं। नियुक्तियों में नाबार्ड और रिजर्व बैंक की ओर से तय योग्यता के मापदंड दरकिनार कर रखे हैं। हकदार ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
खामियों के नमूने
1. ऋण वितरण में गड़बड़ी
- वर्ष 2018 में ऋण माफी के दौरान डूंगरपुर जिले में तकरीबन 150 करोड़ से अधिक की राशि की गड़बड़ी सामने आई। जालोर की 25 जीएसएस में 75 करोड़ का घोटाला।
2. गबन
- सीकरी सहकारी समिति में आठ करोड़ और अलवर, सीकर व पाली केन्द्रीय सहकारी बैंक में करोड़ों का गबन। बीकानेर संभाग में आईना एसीबी ने दिखाया।
3. ऑडिट नहीं
- अधिकांश समितियों की ऑडिट नहीं। विभागीय ऑडिटर की जगह पसंदीदा सीए से ऑडिट करवाने की छूट से बढ़ी लीपापोती।
4. चुनाव पर ब्रेक
- केन्द्रीय सहकारी बैंकों के 2009 और ग्राम सेवा सहकारी समितियों सहित अन्य सहकार संस्थान के चुनाव 2011 के बाद से नहीं हुए हैं। आवासन संघ सहित सात अन्य शीर्ष सहकारी संस्थाओं के चुनाव कभी नहीं हुए।
5. रिक्त पद
प्रदेश की 6633 ग्राम सेवा सहकारी समितियों में से 3145 में नियमित व्यवस्थापकों के पद रिक्त। कई केन्द्रीय सहकारी बैंकों में भी शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक पद रिक्त।
नई नीति से उम्मीद की किरण
केन्द्रीय सरकार 2021-22 में नई सहकार नीति शुरू करेगी। बकौल केन्द्रीय सहकारी मंत्री सहकारिता को लेकर हमें नए सिरे से सोचना होगा, नए सिरे से रूपरेखा तैयार करनी होगी, काम के दायरे का विस्तार करना होगा और पारदर्शिता लानी होगी। अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
यह है असल भावना
देश सहित प्रदेश में 1904 में सहकारिता आंदोलन की नींव रखी गई थी। सहकारी यानी साथ मिलकर कार्य करना। समान आर्थिक उद्देश्य के लिए साथ मिलकर काम करने वाले समिति बना सकते हैं। किसानों, ग्रामीण कारीगरों, भूमिहीन मजदूरों एवं जरुरत मंदों को अच्छा उत्पादक बनाना, किसानों को बिचौलियों से मुक्ति दिलाकर उपज का अच्छा दाम दिलाना उद्देश्य है।
फैक्ट फाइल
प्रदेश में पंजीकृत समितियां- 36122
सक्रिय समितियां-21043
ग्राम सेवा सहकारी समितियां-6670
लेम्प्स- 598
होलसेल भंडार- 37
प्राथमिक डेयरी-15381
क्रय-विक्रय समितियां- 229
इनका कहना है
व्यवसाय विविधिकरण के साथ ही नए कार्य शुरू करने के प्रयास हैं। रिक्त पदों से लेकर कई चुनौतियां जरूर है। सुधार के अवसर तो हमेशा ही रहते हैं। केन्द्र सरकार इसे और आगे ले जा रही है, यह अच्छी बात है। समितियों के चुनाव प्रक्रियाधीन है।
मुक्तानंद अग्रवाल, रजिस्ट्रार, सहकारिता
एक्सपर्ट राय
- समितियों में व्यवसाय के नए मॉडल खड़े करने, पेशेवर लोगों की नियुक्ति, पारदर्शिता, जवाबदेही के साथ आधुनिकीकरण, निष्क्रिय समितियों की सक्रियता, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की जरूरत है। सही मायने में सहकारिता को लोक आधारित आंदोलन बनाना होगा। अभी इसका मूल स्वरूप नहीं दिख रहा। अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप,अयोग्य व दागी लोगों के जमावड़े से व्यवस्थाएं बिगड़ी है। गबन-घोटालों की जांच तीसरी एजेंसी की बजाय विभागीय अधिकारी ही कर रहे हैं। ऐसे में समझ सकते हैं कि सहकारी स्लोगन ‘एक सबके लिए, सब एक के लिए कहां’ सटीक बैठ रहा है।
सूरजभान सिंह आमेरा,
प्रांतीय महासचिव, ऑल राजस्थान कोऑपरेटिव बैंक एम्पलाइज यूनियन
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