जोधपुर. भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) की ओर से हाल ही में किए गए सर्वे में बाड़मेर और जालोर में दुर्लभ मृदा धातुओं के पाए के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। ये धातुएं कार्बोनेटाइट और परएल्कलाइन सिलीकेट्स दोनों ही तरह की चट्टानों में मौजूद हैं। विशेष बात यह है कि इन धातुओं के साथ रेडियोएक्टिव तत्वों की मात्रा निर्धारित मानकों से कम मिली है जिससे धातु निष्कर्षण में स्वास्थ्य व पर्यावरण को भी खतरा नहीं के बराबर रहेगा। दुर्लभ मृदा धातुओं को वर्तमान में इलेक्ट्रोनिक्स उद्योग विशेषकर मोबाइल, सोलर पैनल, विण्ड एनर्जी का मैग्नेट, बैटरी युक्त कारें, इलेक्ट्रोनिक्स गेजेट्स, कलर टीवी, हेडफोन, स्पीकर, एलईडी, सीएफएल, पेट्रोलियम रिफानिंग, न्यूक्लियर एनर्जी, कैंसर उपचार और रक्षा क्षेत्र में इलेक्ट्रोनिक वारफेयर, टारर्गेटिंग एण्ड वेपन सिस्टम, गाइडेंस एण्ड कंट्रोल सिस्टम, इलेक्ट्रोनिक मोटर सहित विभिन्न उपकरणों में किया जा रहा है। अगर बाड़मेर में खानें खोदकर धातु निष्कर्षण कर लिया जाता है जो यह क्षेत्र चीन की तर्ज पर इलेक्ट्रोनिक्स उद्योग का हब बन सकता है। वर्तमान में पूरे विश्व में दुर्लभ मृदा धातुओं में चीन का एकाधिकार है इसलिए चीनी की अर्थव्यवस्था तेजी से ऊपर जा रही है।
हेलीकॉप्टर से किया 22 हजार वर्ग किमी का सर्वे
जीएसआई ने सिवाणा रिंग को केंद्र मानकर हेलीकॉप्टर से 22 हजार वर्ग किलोमीटर में एयरबोर्न मैग्नेटिक सर्वे किया था। फूलन, नाल, रमनियां व भट्टीखेरा सहित कई स्थानों पर अच्छे संकेत मिले हैं। बाड़मेर के कामथाई में कार्बोनेटाइट चट्टानों में दुर्लभ मृदा धातुएं मिली है। कार्बोनेटाइट चट्टानों से धातु निष्कर्षण की विधि वर्तमान में मौजूद है। ऐसे में यहां आसानी से ये धातुएं शुद्धिकरण के बाद प्राप्त की जा सकती है। सिवाणा रिंग कॉम्पलेक्स में सिलीकेट्स के साथ दुर्लभ मृदा धातुएं है। वर्तमान में विश्व में सिलीकेट्स से धातु निष्कर्षण की विधि पर अनुसंधान किया जा रहा है। चीन के पास कार्बोनेटाइट के भण्डार है जबकि कनाड़ा, दक्षिणी अफ्रीका, रूस, अमरीका में सिलीकेट्स के भण्डार अधिक है। पूरा विश्व सिलीकेट्स विधि को विकसित करने में लगा है।
थार में भारी धातुओं की बेहतर उपलब्धता
कुल 14 दुर्लभ मृदा धातुएं है। इसमें सात हल्की व सात भारी मानी जाती है। सामान्यत: 13 हल्की धातुओं के साथ 1 भारी धातु मिलने का अनुपात है लेकिन सिवाणा बेल्ट में यह अनुपात 13 के साथ 3 आ गया है यानी भारी धातुएं अधिक है और भारी धातुओं की ही डिमाण्ड भी अधिक है। बाड़मेर बेल्ट में धातुओं के साथ पाए जाने वाले यूरेनियम का स्तर 60 पीपीएम और थोरियम का 150 पीपीएम से कम होना चाहिए। ऐसे में यहां कैंसर जैसे कारकों का खतरा भी नहीं रहेगा।
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‘बाड़मेर-जालोर बेल्ट में गवेषण कार्य को तीव्रता से किया जाए तो माइनिंग की अपार संभावनाएं है। यह पूरे देश के लिए फायदेमंद होगी।’
-डॉ प्रकाश गोलानी, पूर्व उप महानिदेशक, भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई)
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