मिसाइल से लड़ाकू विमान को बचाएगी चैफ टेक्नोलॉजी

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जोधपुर. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) जोधपुर ने भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों को दुश्मन देशों के राडार और शत्रु मिसाइल से बचाने के लिए एडवांस चैफ टेक्नोलॉजी विकसित की है। जगुआर लड़ाकू विमानों पर ट्रायल के बाद वायुसेना ने इसे हरी झंडी दे दी। डीआरडीओ ने यह तकनीक पुणे स्थित हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेट्री के सहयोग से विकसित की है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और डीआरडीओ प्रमुख जी.सतीश रेड्डी ने इस उपलब्धि के लिए डीआरडीओ जोधपुर को बधाई दी है।

नई तकनीक में लड़ाकू विमान के पायलट को विमान में लगा 100 ग्राम का कार्टिलेज छोडऩा पड़ेगा। यह कार्टिलेज सामने आ रही मिसाइल के सामने एक बादल बना देगा, जो इंसान को नंगी आंखों से दिखाई नहंी देता, लेकिन राडार पर इसका सिग्नेचर आ जाएगा। इसी सिग्नेजर के कारण दुश्मन देश की मिसाइल इस अदृश्य बादल पर हमला करेगी और लड़ाकू विमान सुरक्षित निकल जाएगा।

दुनिया में दो-तीन कंपनियां ही बनाती है चैफ
विश्व में चैफ टेक्नोलॉजी दो-तीन कम्पनियों के पास ही है। भारत, पाकिस्तान और चीन तीनों ही ग्रेट ब्रिटेन की चैमोरिन कम्पनी से यह टेक्नोलॉजी खरीदते आए हैं। इसमें हर साल वायुसेना के करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं। साथ ही एकाधिकार होने के कारण ये कम्पनियां कई बार बेचती भी नहीं थी। अब भारत इसमें आत्मनिर्भर हो गया है।

18 गीगा हट्र्ज राडार को छलने में सक्षम
दुनिया में 2 से 18 गीगा हट्र्ज के राडार आते हैं। विदेशों से खरीदी चैफ टेक्नोलॉजी हाई फ्रीक्वेंसी राडार को भी धोखा देने का दावा करती है, लेकिन वास्तव में 10 गीगा हट्र्ज के बाद उसकी प्रभाविकता कम हो जाती है। डीआरडीओ जोधपुर में विकसित चैफ 18 गीगा हट्र्स तक काम करता है।

सुखोई-रफाल के लिए अलग कार्टिलेज
वायुसेना के सुखोई-30 लड़ाकू विमान सबसे बड़े हैं। इनके लिए बड़े कार्टिलेज बनाने पड़ेंगे। डीआरडीओ जोधपुर ने वायुसेना में हाल ही शामिल रफाल लड़ाकू विमानों के ब्लॉक के बारे में भी पूछा है ताकि उनके लिए भी स्पेशल कार्टिलेज बनाए जा सके।

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पायलट के लिए वर्चुअल टे्रनिंग
चैफ टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के लिए आधा सैकेण्ड से भी कम का समय मिलता है। ऐसे में पायलट को विशेष प्रशिक्षण की जरुरत पड़ेगी। इसके लिए अब हम वर्चुअल सिस्टम तैयार कर रहे हैं, ताकि सीधे विमान पर जाने से पहले पायलट वर्चुअली प्रशिक्षित हो जाए।
-डॉ. रवींद्र कुमार, निदेशक, डीआरडीओ जोधपुर



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