परछाई व आईने की तरह मिला परिजनों का साथ, नेशनल वुशु में जीता गोल्ड मेडल

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जयकुमार भाटी/जोधपुर. बेटियां आज किसी भी क्षेत्र में कम नहीं है। अगर बेटियों को परिवार की ओर से मौका मिले तो वो हर मुकाम हासिल कर सकती है। जब भी बेटियों को अवसर मिला, उन्होंने खुद को साबित किया है। लड़कियों को लडक़ों की अपेक्षा तीन गुणा ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है। इसके बावजूद उन्होंने न केवल चुनौतियों को स्वीकार किया, बल्कि उन पर पार भी पाया है। यह कहना है वुशु नेशनल गोल्ड मेडलिस्ट मंजू चौधरी का। वे कहती है कि उनके पिता ने हमेशा यही सीखाया कि एक सफल पुरूष के जीवन में एक महिला का ही सबसे बड़ा योगदान रहता है।

खेल जगत से जुडा परिवार
मंजू वुशु और बॉक्सिंग की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी हैं। वह पिछले चार सालों से राज्य स्तरीय चैम्पियन रहने के साथ स्कूली वुशु में स्वर्ण पदक विजेता भी हैं। मंजू का पूरा परिवार खेल जगत से जुडा हुआ हैं। उसके पिता भगाराम गोदारा वॉलीबाल में राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहने के साथ राजस्थान पुलिस में कार्यरत हैं। बड़े भाई ओमप्रकाश वॉलीबाल में वेस्ट जोन के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहे हैं। वहीं बड़ी बहन सुनीता भी राष्ट्रीय स्तर की एथलीट रही हैं। सुनिता एथलेटिक्स में 9 बार राजस्थान टीम की मेजबानी करने के साथ राजस्थान की रिकॉर्ड हॉल्डर भी रही है।

बढ़ा वजन और खेल बना चुनौती
मंजू ने बताया कि घर में छोटी होने से परिजनों की लाडली थी। जिसकी वजह से 13 वर्ष की उम्र में मेरा वजन 85 किलो से ज्यादा था। ऐसे में शुरूआत के दिन मेरे लिए काफी मुश्किलों से भरे रहे। जहां एक ओर भाई-बहन शारीरिक रूप से खेल जगत में परिपूर्ण, मजबूत तथा निरंतर अभ्यासरत थे। वहीं दूसरी तरफ रिश्तेदार और पड़ौस के लोग मेरे बढ़े वजन को लेकर मेरे भविष्य की बातें करते रहते थे। ऐसे में मेरे माता-पिता के कहने पर जीवन में कुछ अच्छा करने का लक्ष्य बनाया और वजन कम करने के लिए मैदान में प्रैक्टिस के लिए जाने लगी। वहां चलने वाली वुशु और बॉक्सिंग अकादमी में अपनी उम्र की लड़कियों को अभ्यास करते देखा तो मेरा भी इस खेल के प्रति मनोबल बढ़ा और मैंने भी वुशु और बॉक्सिंग सीखने का मन बनाया। मुझे एक बात का डर था कि घर वाले मेरे इस खेल बॉक्सिंग के लिए सहमत होंगे या नहीं। लेकिन मेरे परिवार वालों का मुझे भरपूर सहयोग और मार्गदर्शन मिला और निरंतर अभ्यास से मैंने 25 किलो वजन कम किया। ऐसे में मैं 60-65 किलो भार वर्ग में खेलने लगी। इस खेल में कोच विनोद आचार्य का बहुत ही सहयोग तथा मार्गदर्शन मिला। जिसकी वजह से पहली बार में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता।

बेटी पर पिता को गर्व
मंजू के पिता भगाराम ने बताया कि बेटी से वुशु और बॉक्सिंग खेलने का सूना तो एकबारगी शंका महसूस हुई कि ये कैसे खेल पाएगी। मंजू की लगन तथा जुनून को देखते हुए हां कर दी और उसने राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर हम सभी को गौरवान्वित किया। मंजू ने उसी वर्ष राष्ट्रीय स्तरीय प्रतियोगिता में दो मुकाबले जीते। मंजू ने बताया कि पापा का सपना था कि मेरी बड़ी बहन अंतरराष्ट्रीय धावक बने। लेकिन वर्ष 2018 में अभ्यास के दौरान कमर में चोट लगने के कारण उसे खेलना छोडऩा पड़ा। उस समय पूरा परिवार बहुत हताश हुआ। ऐसे में मैंने पापा का सपना पूरा करने की ठानी और पढ़ाई के साथ निरंतर अभ्यास में जुट गई। जिसकी वजह से मुझे राष्ट्रीय स्तरीय वुशु प्रतियोगिता में गोल्ड मैडल मिला। मेरे पापा परछाई व आईने की तरह हमेशा मेरे साथ रहे और मेरा देश में नाम हो इसके लिए दोनों का बहुत सहयोग तथा मार्गदर्शन मिला। मेरा भी सपना है कि अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक जीतकर अपने माता-पिता और अपने कोच के नाम करूं।



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