NAND KISHORE SARASWAT
जोधपुर. खुले मैदानों में स्वच्छंद विचरण करने वाले चिंकारे, काले हरिणों के लिए बारिश हर साल जानलेवा आफत बन जाती है। लेकिन पिछले एक दशक से लगातार बढ़ रही समस्या का स्थाई निराकरण अभी तक नहीं मिल सका है। राज्य के वनमंत्री सुखराम विश्नोई की ओर से शुक्रवार को जोधपुर के वन अधिकारियों के साथ हुई बैठक में भी बारिश के दिनों में हर साल जोधपुर जिले में श्वानों के हमलों में बे-मौत मारे जाने वाले वन्यजीवों का मामला उठा भी लेकिन वन अधिकारी मामले पर चुप्पी साधे रहे। वन्यजीवों के मौत का आंकड़ा साल दर साल बढऩे के बावजूद वनविभाग और राज्य सरकार इस पूरे मामले को लेकर संवेदनहीन हैं। हर साल बारिश के मौसम में 700 से 800 वन्यजीव घायल होते है। इनमें जीवित प्रतिशत 25 प्रतिशत से भी कम है। घायल होने का प्रमुख कारण बारिश के मौसम में नमभूमि पर दौडऩे में असमर्थ चिंकारे और काले हरिणों पर श्वान हमला करने से गंभीर घायल हो जाते हैं और समय पर उपचार नहीं मिलने से मौत हो जाती है। तारबंदी में फंसकर अथवा सड़क दुर्घटना से घायलों की तादाद भी बारिश के दिनों में बढ़ जाती है।
हमले के बाद बढ़ जाता है मानसिक भय
हर साल बारिश के मौसम में जिले की विभिन्न क्षेत्रों में मारे जाते हैं। विशेषज्ञ वन्यजीव चिकित्सकों का कहना है कि चिंकारे, ब्लेक बक, चीतल आदि वन्यजीवों में कैप्चर मायोपैथी एक प्रकार मानसिक ग्रंथी होती है जिसका कारण मानसिक भय होता है। इस ग्रंथी में वन्यजीव की मांसपेशी से मायोग्लोबीन नामक पिगमेन्ट रक्त में चला जाता है जिससे किडऩी खराब हो जाती है व अन्त में वन्यजीव की मौत हो जाती है। पिछले एक दशक से समूचे भारत में प्रतिवर्ष सर्वाधिक श्वानों के हमलों में चिंकारे.काले हरिण घायल होते है।
हर साल बारिश में बढ़ रहा वन्यजीवों की मौत का ग्राफ
2016-810
2017-1343
2018-1630
2019-1141
2020-2253
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