कोरोनाकाल में जिंदा हुई चहचहाट फिर से होने लगी गुम

पोस्ट पसंद आये तो लाइक जरुर करे ?

जोधपुर. ठीक एक साल पहले गत मार्च में कोरोना लॉकडाउन में जिसकी चहचहाट घर घर गूंज रही थी वह अनलॉक होते ही फिर से धीरे धीरे कम होती चली गई। इंसानों के घरों में कैद होने पर स्वच्छंद विचरण कर अपना आशियाना बनाने वाली गौरैया की संख्या अनलॉक होने के बाद समूचे विश्वभर में घर आंगनों में चहकने-फुदकने वाली छोटी सी प्यारी चिडिय़ा गौरैया की आबादी में लगातार कमी आई है। गौरैया को बचाने को लेकर हर वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस भी मनाया जाता है। घरेलू पक्षी गौरैया यूरोप और एशिया में सामान्य रूप से पायी जाती है। इसकी छह प्रजातियां हैं। हाउस स्पैरो को ही गौरेया कहा जाता है।

पर्यावरण प्रेमियों का कहना है.

प्रदूषण से होती है प्रजनन क्षमता प्रभावितशहर में बढ़ते प्रदूषण के कारण गौरेया की प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है। वन भूमि पर अंधाधुंध अतिक्रमण और पेड़ों के खात्मे से इनके आशियाने खत्म हो चुके है। खेतों में भी फ सलों के लिए कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल होने से पक्षियों का कुदरती भोजन खत्म हो चुका है। पेड़ों की कमी, सब्जी,फ ल,अनाज में कीटनाशकों का इस्तेमाल,मकानों में वेंटीलेटर तक नहीं होने, घर आपस में सटे होने के कारण घोसला बनाने के लिए जगह नहीं मिलना भी इनकी संख्या में कमी का बड़ा कारण है। शहरी क्षेत्र में स्पैरो के संरक्षण के लिए समन्वित प्रयास की आवश्यकता है। डॉ हेमसिंह गहलोत, वन्यजीव व पक्षी विशेषज्ञ

बर्ड हाउस लगाकर हो रहा संरक्षण

गौरैया संरक्षण की दिशा में जोधपुर में पिछले एक दशक से जोधपुर की यूथ अरण्य संस्था के सदस्य शहरों में तेजी से लुप्त हो रही घरेलु चिडिय़ां को बचाने के प्रयासरत हैं। एक साल पहले लॉकडाउन के दौरान हाउस स्पैरो ने दशकों पुरानी यादें ताजा कर दी थी लेकिन वर्तमान में संख्यात्मक रूप से कमी आई है। इसी कमी को दूर करने के लिए संस्था की ओर से अब तक दो हजार से अधिक बर्ड हाउस बनाकर शहर में जगह जगह स्थापित कर चुके हैं। लॉकडाउन जैसी चिडिय़ों की चहचहाट दोबारा गूंजने लगे इसे लेकर लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। शरद पुरोहित, अध्यक्ष यूथ अरण्य संस्था

गौरेया के लिए लगाए तीन हजार बर्ड फीडर हमनें गौरेया के लिए प्लास्टिक की खाली बोतलों के जुगाड़ से ऐसे बर्ड फ ीडर लगवाने शुरू किए है जिनमें एक भी दाना बेकार नहीं जाता है। बर्ड फ ीडर को शहर के सभी स्थानों पर लगवा रहे हैं। बर्ड फ ीडर में चारों और छेद व दाने के किनारे पर आकर एक जगह रुक जाते हैं । इनके बाहर लगी स्टिक पर चिडिय़ा आसानी से बैठकर दाना चुगती है। इससे दाना आसानी से नीचे नहीं गिरता। नीचे भी प्लेट भी लगती है जो दाने को व्यर्थ होने से बचाती है। क्लब सदस्यों की ओर से शहर के विभिन्न क्षेत्रों में करीब तीन हजार से अधिक बर्ड फीडर लगाए जा चुके है और यह क्रम जारी है। -सुमित माहेश्वरी, सचिव जोधाणा केनल क्लब



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/3907ihr
Share on Google Plus

About Atul

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.

0 comments:

Post a Comment