जोधपुर. सूर्यनगरी की हवा में एक माइक्रोन आकार के कण हवा (पार्टिकुलेट मैटर यानी पीएम) में तैरते हुए मिले हैं, जो श्वास के साथ शरीर में जाकर श्वसन संबंधी कई गंभीर बीमारियों की वजह बनते हैं। जोधपुर में ये अतिसूक्ष्म कण पहली बार रिपोर्ट किए गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित केंद्र सरकार की एजेंसियां वायु प्रदूषण की माप के लिए केवल पीएम-10 और पीएम-2.5 माइक्रोन कणों का मापन करती है। पीएम-1 कण के स्टैंडर्ड अब तक नहीं बनाए गए हैं। जोधपुर में हुए इस शोध से अब एक माइक्रोन और उससे छोटे कणों के लिए मापक बनाने के लिए सरकार विचार कर सकेगी।
लाचू मैमोरियल कॉलेज ऑफ साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी के प्राणी शास्त्र एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के जून 2019 से मार्च 2020 तक हवा की गुणवत्ता मापने के लिए किए गए शोध में एक माइक्रोन के कण पकड़ में आए। इसके लिए कॉलेज ने अल्ट्रा फाइन सेम्पलर मशीन का इस्तेमाल किया।
श्वसन तंत्र के लिए अत्यंत घातक
एक माइक्रोन का अर्थ एक मीटर का 10 लाख वां हिस्सा है। इतने छोटे कण धूल, मिट्टी, वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले धुएं के हो सकते हैं। मनुष्य के शरीर के फेफड़े की सबसे छोटी ईकाई अल्वोली है जिनकी संख्या दोनों फेफड़ों में 300 से 500 मिलियन होती है। इनका औसत व्यास 200 माइक्रोन होता है जबकि मानव के बाल का औसत व्यास 70 माइक्रोन होता है इसलिए अति सूक्ष्म कण श्वसन तंत्र के लिए अति घातक होते है।
शास्त्रीनगर और बासनी में अधिक वायु प्रदूषण
कॉलेज के प्राणीशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ पुनीत सारस्वत के साथ शोधार्थी सुचिता सिंह और श्रेया माथुर ने दस महीनों तक शहर के शास्त्रीनगर और बासनी क्षेत्र में वायु प्रदूषण का मापन किया। दोनों ही स्थानों पर तय मानकों से अधिक पीएम-10 और पीएम 2.5 कण भी मिले। सर्दियों में इनकी मात्रा काफी अधिक थी। गौरतलब है कि पीएम कणों के कारण ही विश्व के सर्वाधिक बीस प्रदूषित शहरों में जोधपुर की गणना होती है।
पर्यावरण मंत्रालय अब बना सकता है मानक
पीएम-1 जैसे अति सूक्ष्म कणो की मात्रा हवा में कितनी होनी चाहिए, इसके मानक तय नहीं किए गए है। हम यह नहीं बता सकते कि इसकी कितनी मात्रा घातक और कितनी संतोषजनक है। पर्यावरण मंत्रालय इन आंकड़ों के आधार पर मानक तय कर सकता है।
-डॉ पुनीत सारस्वत, लाचू कॉलेज जोधपुर
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