बाइक से चलती है तिल की सेली बनाने की घाणी

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खारिया मीठापुर (जोधपुर). सर्दी का मौसम आते ही लोग सेहत के लिए अलग-अलग प्रकार के पाक बना कर खाते हैं । वही गरीब व ग्रामीण क्षेत्र के लोग महंगाई के जमाने में अपनी सेहत के लिए तिल से बनी सेली खाकर अपनी सेहत का ख्याल रखते हैं । सर्दी का मौसम आते ही सेहत का मेवा तिल से बनी सेली की याद जरूर आ जाती हैं । कई लोग इसे देसावर भी ले जाते हैं । सेली लेने के लिए आसपास के गांव से लोग खरीद कर ले जाते हैं तो कई लोग तिली खरीदकर उससे सैली भी बनवा कर ले जाता है । सर्दी में इसे खाने से शरीर में उर्जा व स्पूर्ति आती है। सर्दियों में तिल से बनी सेली खाने का मजा ही कुछ और है। क्षेत्र में ऐसी घाणी शुरू हो चुकी है जो बाइक से चलती है। भीलवाड़ा जिले के कारीगर इस घाणी को चला रहे हैं वे यहां बनी सेली आस-पास के गांव में बेचते हैं । नाहरी गंाव के रहने वाले कारीगर गोपाल गाडरी ने बताया कि यह प्रयोग वह पिछले 5 साल से कर रहे हैं । बिलाड़ा क्षेत्र में पहली बार आए हैं । बैल के लिए चारा पानी व अन्य वस्तुओं की जरूरत होती है ,लेकिन बाइक से संचालित घाणे में केवल पेट्रोल की खपत होती है,ं जो सस्ता भी पड़ता है । सैली बनाने वाली घाणी सौ साल पुरानी है । इससे प्रतिदिन करीब 80 से 100 किलो तक सेली बन सकती हैं । इस साल तिली के भाव 90 से 100 रूपए प्रतिकिलो है। 150 रूपए प्रतिकिलो के भाव से सेली बेची जा रही है । वही तिली लाकर घाणी करवाने वाले ग्राहको से एक घाणी के दौ सौ रूपए लेतेे है।

बाइक संचालित घाणे से घाणी करने मे करीब 25 मिनट का समय लगता है। 1- बनवाने भी आते हैं सेली- खास बात तो यह है कि आसपास के गांव के लोग भी तिल की सैली बनाने भी आते हैं । सैली बनाने में देसी तिल व गुड़ का उपयोग किया जा रहा है । सेली बनते देखने के लिए भी लोग आ रहे हैं । वर्तमान में 3 आदमी काम कर रहे हैं। बाइक से संचालित होने के कारण लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है । सैली स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है । ं2- ऐसे बनती है सेली - सेली बनाने के लिए पहले तीलो को साफ पानी में धोकर सुखाया जाता है । इसके बाद घाणी में पिसाई के लिए गुड़ मिलाकर सेली बनाई जाती है। ं इस प्रकार तैयार सैली आजकल बाजार में मोटरसाइकिल पर बिकने के लिए भी आ रही है। सेली कई प्रकार की बनाई जाती हैं । तिल से बनाई गई सेली के साथ कहीं धनाढ्य लोग सूखे मेवे काजू, किसमिस ,बादाम और पिस्ते मिलाकर सेली तैयार कर खाते हैं । 3- समय के साथ बदला तरीका - परंपरागत तरीके से बनने वाली सेली एक जमाने मेे बेलो से चलने वाली घाणी से बनाई जाती थी। लेकिन महंगाई के जमाने में बैल रखना व उसकी संार- संभाल करना मुश्किल है । समय के साथ उसका भी विकल्प निकल गया । आजकल मोटरसाइकिल व इलेक्ट्रिकल मशीन वाले घाणो से सेली बनाई जाती है । इससे समय की भी बचत हो रही है।



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