जेलों में जाति देखकर बंदियों को दिया जाता है काम

पोस्ट पसंद आये तो लाइक जरुर करे ?

जोधपुर। राज्य की जेलों में आज भी बंदियों से जाति के आधार पर काम करवाया जाता है। निचली जाति के बंदियों के लिए जहां शौचालय साफ करना मजबूरी है, वहीं प्रभावशाली व समृद्ध बंदियों के हिस्से में कोई काम नहीं आता। एक रिपोर्ट में इस चौंकाने वाले खुलासे पर कड़ी टिप्पणी करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है।

न्यायाधीश संदीप मेहता तथा न्यायाधीश देवेन्द्र कछवाहा की खंडपीठ ने मनोज यादव एवं अन्य की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के बाद स्वप्रेरणा से कॉमनवैल्थ ह्यूमन राइट्स इनिसिएटिव (सीएचआरआई) की रिपोर्ट में किए गए खुलासे के आधार पर अतिरिक्त महाधिवक्ता फरजंद अली से पूछा कि राज्य के जेल मैन्युअल में पूर्ण बदलाव को लेकर सरकार क्या कदम उठा रही है? कोर्ट ने राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए कि किसी बंदी को जाति के आधार पर शौचालय की सफाई जैसे कामों में लिप्त होने के लिए मजबूर नहीं किया जाए। किसी भी विचाराधीन कैदी को किसी काम के लिए मजबूर नहीं किया जाए। खंडपीठ ने यह भी कहा कि देश की प्रगतिशील लोकतांत्रिक व्यवस्था और जेलों में उचित स्वच्छता व रखरखाव को सुनिश्चित करने के लिए न्याय हित में यह समीचीन होगा कि राज्य सरकार सभी जेलों में यंत्रीकृत या स्वचालित सफाई सुविधाओं की स्थापना पर विचार करे। अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि अगली सुनवाई 4 फरवरी तक प्रत्युत्तर पेश किया जाएगा।

ब्रिटिशकालीन मैन्युअल आज भी लागू
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सीएचआरआई रिपोर्ट के मुख्य अंशों का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार राजस्थान की जेलों से रिहा विभिन्न कैदियों का साक्षात्कार लिया। एक चौंकाने वाली बात सामने आई कि राज्य की जेलों में आज भी पुरातन जेल मैन्युअल, जो ब्रिटिश शासन का एक उपहार था, अस्तित्व में है। प्रत्येक आरोपी व्यक्ति, जो राज्य की जेल में दाखिल होता है उससे जाति पूछी जाती है। इसके बाद कारित किए गए अपराध की प्रकृति को जाने बिना निचले तबके के बंदियों को शौचालय व जेलों की सफाई जैसे काम सौंपे जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जाति पिरामिड के निचले भाग वाले सफाई का काम करते हैं, उनसे उच्च वर्ग वाले रसोई या लीगल दस्तावेज विभाग को संभालते हैं। जबकि अमीर और प्रभावशाली कोई काम नहीं करते। व्यवस्था ऐसी है कि आरोपी के अपराध से कोई लेना देना नहीं होता।

कई राज्यों में ऐसी ही व्यवस्था
ब्रिटिशकालीन मैन्युअल में बहुत कम संशोधन किए गए हैं। रिपोर्ट इस तथ्य को भी बताती है कि विभिन्न राज्यों के जेल मैन्युअल अब भी पुरातन और अपमानजनक जाति व्यवस्था से ग्रस्त हैं, जिसे भारत के संविधान ने मिटाने का वादा किया गया था।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2KHYkMu
Share on Google Plus

About Atul

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.

0 comments:

Post a Comment