लोंगेवाला के जाबांज भैरोंसिंह राठौड़ का शौर्य भूले मोदी!

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बेलवा/जोधपुर. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर साल की तरह इस साल भी दीवाली का पर्व मनाने के लिए शनिवार को राजस्‍थान के जैसलमेर स्‍थित लोंगेवाला पोस्ट में तैनात सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों के पास पहुंचे और उनका हौंसला बढ़ाया। साथ ही उन्‍होंने पाकिस्‍तान और चीन को सख्‍त संदेश दिया और कहा कि यदि आजमाने की कोशिश करेंगे तो उन्‍हें प्रचंड जवाब मिलेगा।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने सरहद पर तैनात जवानों के परिजनों को भी नमन किया और कहा, 'मेरी दीवाली जवानों के बीच ही पूरी होती है। आप हैं तो देश का त्‍योहार है। उन्‍होंनेे आगे 1971 के भारत पाक युद्ध का जिक्र करते हुए कहा, 'हर किसी की जुबां पर लोंगेवाला पोस्‍ट का नाम है। लोंगेवाला पोस्‍ट पर शौर्य गाथा लिखी गई है। पराक्रम की चर्चा होगी तो बैटल ऑफ लोंगेवाला को जाना जाएगा, पराक्रम की चर्चा होगी तो बैटल ऑफ लोंगेवाला को जाना जाएगा।'


मेजर कुलदीप सिंह का जिक्र, भैरोंसिंह राठौड़ को भूले

लोंगेवाला पोस्ट से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मेजर कुलदीपसिंह चांदपुरी के असाधारण शौर्य से दुश्मनों को धूल चटा दी। उन्होंने कहा मेजर कुलदीप पराक्रम से राष्ट्रदीप बन गए। लेकिन अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी लोंगेवाला के जाबांज सिपाही भैरोंसिंह राठौड़ का जिक्र करना भूल गए। जिनके शौर्य, पराक्रम व कुशलता से कई पाकिस्तानी युद्ध टैंक ध्वस्त करके 1971 के युद्ध में पाक सैनिकों के दांत खट्टे किये थे।

शेरगढ के शौर्यवीर है भैरोसिंह

जाबांज सिपाही भैरोंसिंह अपनी ही सरजमीं पर गुमनामी की जिंदगी जी रहे है। वीर प्रसूताओं की धरा शेरगढ़ के सोलंकियातला गांव में जन्मे भैरोंसिंह राठौड़ बीएसएफ की जैसलमेर के लोंगेवाला पोस्ट पर 14 बटालियन में तैनात थे। शेरगढ़ के सूरमा भैरोसिंह ने एमएफजी से करीब 30 से ज्यादा पाकिस्तानी दुश्मनों को ढेर किया था।

शौर्यवीर भैरोंसिंह की वीरता व पराक्रम के कारण सन 1997 में रिलीज हुई बॉर्डर फिल्म में सुनील शेट्टी ने भैरोसिंह राठौड़ का रोल अदा किया था। फिल्म में भैरोंसिंह को शहीद बताया गया था हालांकि असल जिंदगी में फिल्म के रियल हीरो भैरोंसिंह आज भी पूरे जज्बे के साथ जीवन यापन कर रहे हैं।

1971 के युद्ध मे उनके पराक्रम पर राठौड़ को तत्कालीन मुख्यमंत्री बरकतुल्लाह खान ने सेना मेडल से नवाजा था। हालांकि बीएसएफ द्वारा उनको सैन्य सम्मान के रूप में मिलने वाले लाभ व पेंशन अलाउंस नहीं मिल पा रहे हैं। जिससे वह गुमनाम जीवनयापन कर रहे हैं।

गौरतलब है कि सन 1963 में बीएसएफ में भर्ती होकर राठौड़ 1987 में रिटायर्ड हुए थे। लेकिन आज 75 साल की उम्र में भी एक जवान की तरह दिनचर्या में जीवन यापन कर रहे हैं।



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