जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने चित्तौडगढ़़ में ब्रॉडगेज लाइन बिछाने के लिए वर्ष 1985 में अवाप्त की गई भूमि का साढ़े तीन दशक तक कोई उपयोग नहीं करने के बाद अब आवासीय निर्माण कार्य शुरू करने पर रोक लगा दी है। मामले की अगली सुनवाई 8 दिसंबर को होगी। न्यायाधीश संदीप मेहता की एकलपीठ में याचिकाकर्ता इंद्रजीतसिंह सेठी की ओर से अधिवक्ता संजीत पुरोहित ने कहा कि वर्ष 1985 में रेलवे ने चित्तौडगढ़़ से कोटा के बीच ब्रॉडगेज बिछाने के लिए तत्काल प्रावधानों के तहत कई खातेदारों की भूमि अवाप्त की थी, जिनमें याचिकाकर्ता की खसरा संख्या 2701 तथा 2702 की भूमि भी शामिल थी। बाद में रेलवे ने उपयोग में नहीं आई अधिशेष भूमि को लेकर खातेदारों को यह प्रस्ताव दिया कि वे भुगतान किए गए मुआवजे को लौटाते हैं तो उनकी भूमि पुन: हस्तांतरित कर दी जाएगी। याची ने भी तत्समय उपलब्ध राशि का भुगतान रेलवे को किया, जिसके एवज में उसे एक खसरे की भूमि लौटा दी गई, लेकिन दूसरे खसरे की भूमि का भुगतान नहीं होने से वह रेलवे के खाते में ही रही। इस अवाप्ति को बाद में अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिस पर वर्ष 1995 अवाप्ति अधिसूचना निरस्त कर दी गई। तब से याची कई बार रेलवे को मुआवजे की राशि लौटाने का प्रस्ताव देते हुए भूमि पुन: हस्तांतरित करने की मांग कर चुका है, लेकिन रेलवे ने कोई कदम नहीं उठाया। पुरोहित ने कहा कि भूमि की अवाप्ति ब्रॉडगेज के लिए तत्काल प्रावधान के तहत की गई थी, लेकिन भूमि का उपयोग उसके लिए नहीं किया गया। यहां तक कि रेलवे की सीमा और प्रश्नगत भूमि के बीच 400 फीट से ज्यादा का फासला है और इसमें कई आवासीय व संस्थानिक निर्माण हो चुके हैं। हाल ही रेलवे ने भूमि पर ब्रॉडगेज बिछाने से इतर निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया है, जिससे याची को अपूरणीय क्षति होगी। एकलपीठ ने रेलवे को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
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