नंदकिशोर सारस्वत
जोधपुर. बुराई पर अच्छाई की जीत के पर्व विजयदशमी के दिन मेहरानगढ़ में सदियों पुरानी परम्परा दशहरा दरबार नहीं सजेगा। कोविड-19 और जिला प्रशासन की गाइडलाइन के कारण दशहरे के दिन किए जाने वाला अश्व, पारम्परिक शस्त्रों एवं शमी (खेजड़ी) पूजन भी प्रतिकात्मक ही होगा। किले के ही मुरली मनोहरजी मन्दिर से दशानन दहन स्थल रावण चबूतरा मैदान तक भगवान रामचन्द्र की सवारी भी इस बार नहीं निकलेंगी। मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट के निदेशक करणीसिंह जसोल ने बताया की शस्त्र व शमी पूजन की परम्परा इस बार कोविड के कारण उम्मेद भवन में प्रतिकात्मक रूप से की जाएगी।
पूरे मारवाड़ परगनों का राजस्व होता था जमा
देश आजाद होने से पूर्व तक मेहरानगढ़ के दशहरा दरबार में मारवाड़ के विभिन्न परगनों के हाकम अपने अपने क्षेत्र में अर्जित साल भर के राजस्व का हिसाब पेश कर अर्जित राशि को जोधपुर खजाने में जमा कराते थे। महाराजा तख्तसिंह के समय तक शस्त्र पूजन बाड़ी के महलों के पास जनानी ड्योढ़ी की सीढिय़ों के पास होता था जिसका संदर्भ दस्तरी बही में मिलता है।
डॉ.एमएस तंवर, विभागाध्यक्ष, महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केन्द्र, मेहरानगढ़
आजादी के बाद बदल गया दशहरा दरबार का स्वरूप
देश आजाद होने से पूर्व विजयदशमी को मेहरानगढ़ में सजने वाले दशहरा दरबार में राजपरिवार के सदस्य , जागीरदार , सिरायत , इत्यादि अपनी तलवारों को म्यान से निकालकर एक - एक कर जोधपुर महाराजा के सामने प्रस्तुत करते थे और प्रत्येक तलवार पर कुमकुम का तिलक व अक्षत लगाकर सांकेतिक पूजन किया जाता था। देश आजाद होने के बाद सांस्कृतिक व धार्मिक परम्पराएं जारी रही लेकिन उनके स्वरूप में काफी बदलाव आ गया।
पहले जालोरी दरवाजे के बाहर होता था दहन
जोधपुर में विजयदशमी को रावण दहन पहले जालोरी दरवाजे (जालोरीगेट ) के बाहर ही होता था उसके बाद दहन स्थल वर्तमान रावण का चबूतरा बनाया गया। दहन के बाद जब राम की सवारी वापिस किले लौटती तब तक अंधेरा होने के कारण कोतवाली की तरफ से प्रकाश के लिए दिवड़ों का इंतजाम होता था ।
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