सुरेश व्यास-अविनाश केवलिया
जोधपुर। पाकिस्तान में धार्मिक उत्पीडऩ और हर वक्त मौत का खतरा। जान बचाकर भारत आने में ही पहले तो बहुत कुछ लुट जाता है और यहां आने के बाद भी एजेंटों के जाल में ऐसा उलझते हैं कि निकल पाना मुश्किल होता है। कई परिवार तो हारकर वापस पाकिस्तान लौट जाते हैं मौत के मुंह में।
पिछले दिनों उत्पीडऩ का शिकार होकर भारत आए विस्थापित परिवार के 11 लोगों की मौत के बाद ‘पत्रिका’ की पड़ताल में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इन एजेंट्स का जाल भारत-पाकिस्तान दोनों ही जगह समानान्तर रूप से फैला हुआ है। यहां तक कि स्थानीय स्तर पर फोरोनर्स रजिस्ट्रेशन ऑफिस, दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्रालय और पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास तक इस नैक्सस की जड़ें फैली हुई हैं। करीब दो साल पहले गृह मंत्रालय के एक अवर सेक्रेट्री समेत तीन लोगों की जोधपुर में हुई गिरफ्तारी से भी इसकी पुष्टि हो चुकी है।
विस्थापन है मजबूरी
पाक के सिंध प्रांत में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। वहां अधिकांश वे लोग रहते हैं जो बंटवारे के बाद या तो वहीं रह गए या फिर सीमावर्ती जिलों से पाकिस्तान में चले गए। विस्थापितों के लिए काम करने वाले सीमांत लोक संगठन के मुखिया हिन्दूसिंह सोढ़ा कहते हैं कि सिंध प्रांत में हिन्दू परिवारों का धार्मिक उत्पीडऩ तेजी से बढ़ा है। बहन-बेटियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह के मामले तो आए दिन सामने आते हैं। हाल ही लगभग दो सौ हिन्दूओं का सिंध में धर्मपरिवर्तन करवाया गया। मंदिरों में तोडफ़ोड़ तो आम बात है। ऐसे में पाकिस्तान से धार्मिक या विजीटर वीजा पर भाग निकलना इन लोगों की मजबूरी बन चुका है।
निकल पाना भी आसान नहीं
उत्पीडऩ के शिकार इन लोगों का पाकिस्तान से निकलना भी आसान नहीं है। घर छोडऩे का मन बनाने के साथ ही इन लोगों को संगठित नैक्सस के जाल में फंसना पड़ता है। ये लोग धार्मिक या विजिटर वीजा पर ही भारत आ सकते हैं। वीजा के लिए एजेंट के जरिये मोटी रकम वसूली जाती है। इसके बाद किसी धार्मिक जत्थे के साथ उन्हें हिंदुस्तान भेजा जाता है। धार्मिक वीजा जोधपुर-जैसलमेर (रामदेवरा), दिल्ली, हरिद्वार या द्वारका के नाम से मिलता था, लेकिन अब जोधपुर का वीजा नहीं दिया जा रहा। यहां आने के बाद एजेंट स्टेशन पर ही घेर लेते हैं। उन्हें हरिद्वार या द्वारका जाने के लिए दबाव बनाया जाता है। लोग जाना नहीं चाहते तो मोटी रकम वसूलने तक कोई निकल नहीं पाता। हरिद्वार चले गए तो वहां से लौटने के लिए जेब ढीली करनी ही पड़ती है।
फिर एसटीवी-एलटीवी का झंझट
विस्थापित यहां आने के बाद कहते हैं कि उन्हें वापस पाकिस्तान नहीं जाना तो पहले शॉर्ट टर्म वीजा (एसटीवी) और फिर लॉन्ग टर्म वीजा (एलटीवी) के लिए पिसना पड़ता है। पहले छह माह के लिए एसटीवी मिलता है और फिर अलग-अलग प्रावधानों के हिसाब से बारह और सात-सात साल का एलटीवी, लेकिन एजेंट्स-एफआरओ का शिकार यहां भी होना पड़ता है। निर्धारित मियाद पूरी करने के बाद ही ये भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। सोढ़ा के अनुसार पश्चिमी राजस्थान में १० हजार से ज्यादा लोग अभी एलटीवी पर रह रहे हैं।
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