जोधपुर. पश्चिमी राजस्थान से गुजरते राष्ट्रीय राजमार्गों, मेगा हाइवे सहित राज्य मार्गों पर प्रतिदिन 50 से अधिक वन्यजीव, पक्षी, सरिसृप और मवेशी घायल होकर दम तोड़ रहे है। जोधपुर से नागौर, जैसलमेर, बाड़मेर, पाली,सिरोही हाइवे पर घायल वन्यजीवों के लिए किसी भी तरह की रेस्क्यू व्यवस्था नहीं है। नेशनल हाइवे आथॉरिटी के साथ ही सड़क निर्माण विभाग से लेकर पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति के तहत वन्यजीवों की सुरक्षा करना भी संवैधानिक रुप से महत्वपूर्ण दायित्व है। परन्तु सड़क निर्माण में हाइवे आथॉरिटी और जिला प्रशासन की ओर से नियमों और शर्तों की अनदेखी वन्यजीवों पर भारी पड़ रही है। पश्चिमी राजस्थान में राजमार्गों के निर्माण की स्वीकृति की शर्ते भी अत्यंत लचीली होने का खामियाजा बेकसूर वन्यजीवों को मौत के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
घायलों का कोई धणी धोरी नहीं
पिछले पांच साल से जोधपुर पाली हाइवे पर घायल वन्यजीवों और मवेशियों को निस्वार्थ रेस्क्यू सुविधा उपलब्ध कराने वाले रोहट निवासी ललित पालीवाल ने बताया की घायल वन्यजीवों का कोई धणी धोरी नहीं है। टोल हेल्पलाइन टीम के लोग घायल वन्यजीवों को सड़क से हटाकर किनारे पटक देते है। नतीजन कई बार घायल मौके पर ही तड़प कर दम तोड़ देते है। इस बारे में टोल वालों का कहना है की हमारा काम सिर्फ हाइवे को क्लीयर रखना है ना की घायलों को रेस्क्यू करना है ।
हाइवे ऑथरिटी सुविधा कराए
राष्ट्रीय राजमार्गों के तय नॉम्र्स के अनुसार वन्यजीवों को सड़क पार करने के लिए नीचे से सुंरगनुमा मार्ग विकसित करने की जरूरत है। बिश्नोई टाईगर्स वन्य एवं पर्यावरण संस्था के प्रदेश अध्यक्ष रामपाल भवाद का कहना है की हाइवे पर चेतावनी होर्डिंग लगाने, टोल ठेकेदारों की ओर से नेशनल व स्टेट हाइवे पर वन्यजीव रेस्क्यू वाहन होने चाहिए। मानव जीवन के साथ ही पशु-पक्षी,वन्यजीवों के लिए जिला प्रशासन व नेशनल हाइवे ऑथरिटी की तरफ से सुरक्षा संबंधी कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं जारी करना गंभीर लापरवाही है।
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