प्राचीन ग्रंथों के डिजिटलाइजेशन में कोरोना बना बाधक -
12वीं से 20 वी सदी के 1.23 लाख ग्रंथ से लाभान्वित होते है देश विदेश के शोधार्थी
जोधपुर. राजस्थान सरकार के कला संस्कृति मंत्रालय विभाग के राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में बारहवीं से 20 वीं सदी के 24 विषयों के कुल 1.23 लाख दुर्लभ ग्रंथों के डिजिटलाइजेशन का कार्य कोरोना संक्रमण के कारण अटक गया है। विभाग ने शोध अध्येताओ के लिए हस्तलिखित ग्रंथों एवं संदर्भित पुस्तकों को सीधे कम्प्यूटर पर देखने की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए डिजिटलाइजेशन कार्य आरंभ किया था। डिजिटलाइजेशन के दौरान 1.23 लाख ग्रंथों में से जोधपुर मुख्यालय सहित प्रदेश की शाखाओं में 90 प्रतिशत से अधिक ग्रंथों के डिजिटलाइजेशन का कार्य पूरा हो गया है लेकिन कुछ जगहों पर कोरोना लॉकडाउन के कारण काम रूका पड़ा है। जर्जर अवस्था में प्राचीन ग्रंथ को पठन-पाठन के लिए सुरक्षित बाहर निकालने एवं पुन: रखने के दौरान होने वाली औपचारिकताओं और परेशानियों के कारण डिजिटलाइजेशन का निर्णय लिया गया था। विगत एक दशक के दौरान करीब दो हजार से अधिक शोधार्थी प्रतिष्ठान से लाभान्वित हो चुके है। संस्कृति विभाग भारत सरकार की ओर से स्थापित राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की योजनाओं के तहत प्रदेश की सभी शाखाओं में प्राचीन पाण्डुलिपियों और ग्रंथों के डिजिटलाइजेशन का काम किया जा रहा है।
कहां कितने ग्रंथ
बीकानेर-29429, कोटा-9966, जयपुर- 13047, जोधपुर-41700, उदयपुर-6910, चित्तौड़-5456, अलवर-7559 भरतपुर-10123
आधुनिक संदर्भ पुस्तकालय का कार्य भी अटका
प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में करीब डेढ़ करोड़ की लागत से निर्माणाधीन आधुनिक संदर्भ पुस्तकालय अधूरा पड़ा है। आरएसआरडीसी के अधिकारियों का कहना है कि कोरोना लॉकडाउन के कारण फर्नीचर, पैनल आदि लगाने का कार्य और फाइनल फिनिशिंग बाकी रह गया है।
जल्द पूरे होंगे अधूरे कार्य
राजस्थान की सभी शाखा कार्यालयों एवं निदेशालय में करीब 90 प्रतिशत तक प्राचीन ग्रंथों के डिजिटलाइजेशन कार्य पूरा हो गया है। जल्द ही शेष कार्य पूरा कर ग्रंथों को ऑनलाइन किया जाएगा। इसके लिए प्रस्ताव पहले ही भेजा जा चुका है। संदर्भ पुस्तकालय निर्माण पूरा करने के लिए आरएसआरडीसी अधिकारियों से बातचीत की गई है।
बीएल मेहरा, निदेशक, राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर।
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