World Hindi Day : विश्व हिन्दी की सफल प्रयोगशाला जोधपुर

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एम आई जाहिर / जोधपुर ( jodhpur news. current news ). राष्ट्र भाषा हिन्दी के भाषा और साहित्य के मामले में जोधपुर बहुत सौभाग्यशाली और समृद्ध रहा है। जोधपुर की इस विशेषता का हिन्दी साहित्य के दो सशक्त हस्ताक्षरों अज्ञेय ( Agye ) और डॉ नामवरसिंह ( Dr Namwarsingh ) ने भी लोहा माना है। जोधपुर के विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो वी वी जॉन दूसरे विषयों के विशेषज्ञों की तरह हिन्दी के इन दो शीर्ष हस्ताक्षरों को भी जोधपुर के विश्वविद्यालय में लाए थे। अज्ञेय यहां लोक साहित्य के विभागाध्यक्ष तो डॉ. नामवरसिंह ( Dr Namwarsingh ) हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे। अपने जोधपुर प्रवास के दौरान यहां का साहित्यिक माहौल देख कर अज्ञेय ने कहा था कि जोधपुर विश्व हिन्दी की प्रयोगशाला है। वहीं जोधपुर से सांसद व भारतीय ज्ञानपीठ ( bhartiya gyanpeeth ) के अध्यक्ष रहे डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने हिन्दी शब्दकोश को 'लोकपाल' व 'लोकायुक्त ' दो शब्द दिए थे। उन्होंने उच्चायुक्त रहते हुए ब्रिटेन के उच्चायोग में हिन्दी टाइपिंग शुरू करवाई थी। वहीं पत्नी कमला सिंघवी के गहने गिरवी रख कर टैगोर की पाण्डुलिपियां ब्रिटेन से भारत लाए थे। भाषा व साहित्य के लिए यह अवदान अविस्मरणीय है। अज्ञेय की सोच के अनुरूप उनके प्रवास के दौरान और उसके बाद से आज तक जोधपुर हिन्दी साहित्य की सफल प्रयोगशाला सिद्ध हुआ है। अब इसका कैनवास और फैल गया है। आज इस शहर के कई साहित्यकार देश-विदेश में जोधपुर का नाम रोशन कर रहे हैं। यह एक लंबी सूची है। विश्व हिन्दी दिवस ( World Hindi Day ) पर पत्रिका ने जोधपुर के चुनिंदा साहित्यकारों से हिन्दी के बारे में उनकी राय जानी। पेश है उनसे हुई बातचीत के अंश :

सही उच्चारण का ध्यान रखें

मां हिन्दी तेरे आंचल में,जो भी पले वे अजर अमर हैं, जिनको तेरी गोद मिली,वो विश्व में पूज्य धरा के दिनकर हैं..। हिन्दी के महत्व, हिन्दी के प्रचार-प्रसार को लेकर उत्साह का एक नहीं,अनेक अनकही बातें आज के दिन दोहराई जायेंगी। किन्तु हिन्दी की बिन्दी की चमक उच्चारण, भाषण अथवा कार्यक्रमों में धुंधलाती देख जागने का भ्रम आज भी छुपाया जायेगा। हिन्दी के एक सामान्य वाक्य, वाक्य उच्चारण, उसे शब्दों में व्यक्त करते अन्यान शब्द न मिलाया जाय तो वाक्य पूरा ही नहीं होता। बस इस पर भी ध्यान देने का दिन है, आज : केवल एक दिन। आज जय हिन्दी का उद्घोष तो होगा ही?

-सुशील व्यास, वरिष्ठ कवि व गीतकार

समृद्ध है हिन्दी का साहित्य

गांधी जीे सन 1909 से ही हिन्दी का महत्व समझ गए थे। इसीलिए उन्होंने 'हिन्द स्वराज' में स्पष्ट रूप से लिखा था- ' हिन्दी ही भारत की भाषा' हो सकती है। जर्मन में लेगर लुत्से ने महत्वपूर्ण कवियों की कविताओं का जर्मन में अनुवाद किया है। कामिल बुल्के का शब्दकोश तो अधिक प्रामाणिक माना जाता है। उदयप्रकाश के साहित्य का जर्मन सहित कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। पत्रिका 'पहलÓकई देशों में पढ़ी जाती है तथा उस पर शोध हो रहे हैं। जापान, अमरीका व अरब आदि देशों से भी पत्रिकाएं छप रही हैं। हिन्दी का साहित्य सृजन विश्व की किसी भी भाषा के साहित्य से अधिक समृद्ध है।

-डॉ सत्यनारायण, वरिष्ठ कथाकार व पूर्व विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता विभाग, जेएनवीयू,जोधपुर

तेजी से हिन्दी का बोलबाला

विश्व में 70 करोड़ हिन्दी भाषी लोग होने के साथ ही यह संसार में सर्वाधिक प्रचलित तीसरी भाषा है। इसने उर्दू व अंग्रेज़ी आदि कई भाषाओं के शब्द अपना कर इसे आम हिन्दुस्तानी की सुगम भाषा बना दिया है। सिनेमा,संगीत व वैश्विक व्यापार वृद्धि ने इसका प्रचलन व महत्व बढ़ा दिया है। विदेशों में 24 से अधिक पत्र पत्रिकाएं हिंदी में प्रकाशित हो रही हैं। अकेले अमरीका के ३२ विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। अपने देश में आज भी सेलिब्रिटीज व उच्च वर्ग के लोग हिन्दी में बात करना हेय समझते हैं। वे अंग्रेज़ी में ही बोलते हैं। अंग्रेज़ों की यह दास वृति अधिक चलने वाली नहीं है।

-मुरलीधर वैष्णव, वरिष्ठ साहित्यकार व पूर्व न्यायाधीश

सर्वाधिक तेजी से प्रसार वाली भाषा

विश्व में सर्वाधिक ध्वनियों वाली भाषाओं में से एक हिन्दी दुनिया भर में सर्वाधिक बोली जाने वाली और सर्वाधिक तेजी से प्रसार करने वाली भाषाओं में से भी एक है। हिन्दी अपनी बेहतर ग्राह्य क्षमता के कारण आधुनिक-बोध की शब्दावली को सहज रूप से अपना लेने में सक्षम होने से यह इस सदी की निरन्तर विकास करती रहने वाली भाषा बनी रहेगी। यह भी सच है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। और, हिन्दी बाजार के काम-काज के लिए भी उपयोगी होने के साथ-साथ सरल सम्प्रेषणीयता के अनुकूल भी है। अत: विश्व भाषा परिवार में हिंदी का वर्चस्व स्वाभाविक रूप से बना रह सकता है।

-डॉ हरीदास व्यास, वरिष्ठ कथाकार व कवि

हिन्दी ने गौरवपूर्ण स्थान बनाया

दुनिया में सर्वाधिक बोले जाने वाली अंग्रेजी और चीनी भाषाओं के साथ हिन्दी अपना गौरवपूर्ण स्थान बना चुकी है। इसके अलावा हम देख रहे हैं कि विश्व मंच पर करतल ध्वनि के साथ हिन्दी में वक्ताओं को सुना जाने लगा है। हिन्दी के लिए यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं है। इसका कारण हिन्दी भाषा में निहित हमारे देश की जाग्रत संस्कृति का सामासिक स्वरूप है। इसके अलावा हिन्दी ने दुनिया में रोजगार के नए द्वार खोले हैं। बढ़ते वैश्वीकरण ,बाजारवाद,संचार साधन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है।

-डॉ रमाकांत शर्मा, वरिष्ठ कवि व आलोचक

हिन्दी विश्व की यात्रा कर रहीहिन्दी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बना रही है । फिल्म गांधी ,कृष्ण ,राम , महाभारत, रामचरित मानस , सूर, तुलसी ,कबीर और मीरां के साथ-साथ हिन्दी विश्व की यात्रा कर रही है। यह समकालीन चुनौतियों से निपटने के लिए आधुनिक भावबोध और आवश्यकता के अनुरूप ढल रही है। सबसे ज्यादा हिन्दी का प्रचार वह भी विदेशों में हिन्दी की फिल्मों ने किया है। भाषा ही नहीं, भारतीय कल्चर भी दिखाया है। इसके गानों की मिठास किसी सरहद या जाति या धर्म को नहीं मानती ,फिर भी हम आज भी फिल्मों तक को हेय दृष्टि से देखते हैं। विश्व के 50 देशों में हिन्दी की फिल्में दिखाई जाती हैं।

-डॉ.पद्मजा शर्मा, कवयित्री व शब्द चित्रकार

विश्व के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही

आज विश्व के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। इक्कीसवीं सदी में वही भाषा जीवित रहेगी, जो कम्प्यूटर और बाजार की भाषा होगी, लिप्यंतरण की सुविधा के कारण आप किसी भी भाषा व लिपि में टाइप करें, वह आपके चाहने से हिन्दी भाषा में भी टाइप हो जाएगा, इस लिप्यंतरण के लिए बहुत से गूगल टूल्स उपलब्ध हैं। विदेशी उद्योग को यहां का बाजार चाहिए तो वे हिन्दी भी जानेंगे, उन्हें यहां की भाषा सीखनी ही पड़ेगी। अब हिन्दी विश्व मे सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा मैन्ड्रिन (चीन ) को चुनौती देती दिखाई दे रही है। निस्संदेह यह विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है।

डॉ.कैलाश कौशल, निबंधकार, प्रोफेसर व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर

वैश्विक स्वरूप विश्व की अनिवार्यता

वर्षोंं से यह बात कही जा रही है कि अंग्रेजी के बगैर दुनिया का कामकाज नहीं चल सकता। इसका प्रतिकार करते हुए विश्व के कई देशों में अपनी-अपनी भाषाओं पर काम किया गया। संख्यातीत संस्थान बने और बाजारवाद की भावना के साथ भाषाओं का साम्राज्य खड़ा करने के सारे जतन होने लगे। जापान आदि कई देशों में हिन्दी के विश्व स्तरीय स्वरूप पर खासा काम हो रहा है। आज विश्व भर में हिन्दी भाषी लोग हैं तथा हिन्दी की चर्चा हो रही है। हिन्दी बोली जाती है और इस भाषा में लेखन-प्रकाशन हो रहा है। कुल मिला कर कहें तो महत्वपूर्ण बात यह है कि आज हिन्दी भाषा विश्व की अनिवार्यता है।

सत्यदेव संवितेंद्र, वरिष्ठ कवि व निबंधकार

विश्व में हिन्दी का महत्व अधिक

चीन, अमरीका, जापान, फिजी, मॉरिशस व अन्य अनेक देश आज अपनी अर्थव्यवस्था का आधार देने के लिए भारत के बाजारों पर निर्भर हो गये हैं। जब-जब भारत-चीन संबंध बिगड़ते हैं, इसका सीधा खामियाजा चीन के बाजारों पर पड़ता है। ऐसे में इन देशों के लोग हिन्दी सीख रहे हैं, ताकि उनकी मार्केटिंग में देशज पुट आए एवं वे हमारे उपभोक्ताओं से सीधे संपक कर सकें। विकसित देश आज हमारा पुरातन वैभव टटोल रहे हैं। विदेशों में आज वेद, पुराण, ज्योतिष एवं अन्य अनेक पुरातन विज्ञानों को पढऩे की होड़ मच गई है। हिंदी का वैश्चिक महत्व इस नाते भी बढ़ा है।

-हरिप्रकाश राठी, वरिष्ठ कथाकार व कवि

हिन्दी मानव मात्र के लिए ज्योति-स्वरूप

विश्व-पटल पर अपनी उपस्थिति और पहचान का यह दिन हमें याद दिलाता है कि हिन्दी आज अपनी सीमाओं से बाहर निकल कर संसार के कोने -कोने में पैठ बना चुकी है। यह इसलिए सम्भव हो सका है क्योंकि हिन्दी सिर्फ एक भाषा मात्र नहीं है, बल्कि वह मानव मात्र के लिए ज्योति-स्वरूप है हिन्दी भाषा आज नए युग में प्रवेश कर गयी है, जहां उसने अपनी तमाम बेडिय़ों को तोड़ कर अपने संसार को बड़ा किया है। संचार व सूचना प्रौद्योगिकी से अपने को जोड़ कर उसने अपने को प्रासंगिक बनाया है। आज वह लोक -व्यवहार, आचरण व ज्ञान-विज्ञान की भाषा है।

डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय, सदस्य, हिन्दी परामर्शदात्री समिति, साहित्य अकादमी



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