Saint Chandraprabhasagar ने कहा कि जीने की कला सीखें तो जीवन बांस नहीं

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जोधपुर ( jodhpur news.current news ) . राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ सागर ( Nation saint Chandraprabhasagar ) ने कहा कि जीवन प्रभु का प्रसाद है, जिन्हें जीने की कला आती है उनका जीवन बांस नहीं, संगीत पैदा करने वाली बांसुरी बन जाता है। हम रो कर जीते हैं या हंस कर, यह हमारे ऊपर निर्भर है, जो रो कर जीते हैं, वे हर दिन मरने की सोचते हैं, पर जो हंस कर जीते हैं, वे हर क्षण को प्रभु का प्रसाद मान कर आनंद भाव से जीते हैं। वे कायलाना रोड स्थित ( Jain news ) संबोधि धाम ( sambodhi dham ) में आयोजित आर्ट ऑफ एंजॉय फुल लाइफ प्रोग्राम ( Art of Enjoyable Life program ) में शहर के बाशिंदों को संबोधित ( lecture ) कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमें सुबह उठने के बाद और सोने से पहले प्रभु को शुक्राना अवश्य समर्पित करना चाहिए, जिसकी कृपा से हमें दुनिया का सबसे दुर्लभ मनुष्य जीवन मिला, जीने की व्यवस्था मिली और जीवन में कुछ कर गुजरने की सोच बनी। अगर हम शुक्राना के भाव से भरे रहेंगे तो हमें थोड़ा भी बहुत लगेगा और शिकायत के भाव से भरे रहेंगे तो सब कुछ भी थोड़ा ही लगेगा।

संत प्रवर ने कहा कि जो लोग प्यार से जीते हैं उन्हें जीते जी भी याद किया जाता है और मरने के बाद भी, पर जो लड़ लड़ कर जीते हैं वे जीते जी भी खटकते हैं और मरने के बाद बहुत जल्दी भुला दिए जाते हैं। जीवन को आनंद पूर्ण तरीके से जीने के लिए जरूरी है कि हम तकरार हटाएं और प्यार बढ़ाएं।उन्होंने कहा कि हमें गुस्सा करने, नाराजगी दिखाने, गाली देने या नफरत करने का हक है, पर हम उसकी लिमिट अवश्य बनाएं। उसे सेकंड या अधिकतम मिनटों में खत्म करने की कोशिश करें। अगर हम घंटों तक नफरत और नाराजगी में जीएंगे तो इंसान के तल से गिर कर पशु के तल पर पहुंच जाएंगे।

संत प्रवर ने कहा कि स्वर्ग आसमान में या नरक पाताल में नहीं, बल्कि हमारी हथेली में ही है। अगर हम अतीत को देखते रहेंगे तो नरक की आग में झुलसते रहेंगे, हमें अतीत की यादों में खोए रहने के बजाय भविष्य के ऊंचे और अच्छे सपने देखने चाहिए और वर्तमान को उसके लिए समर्पित करना चाहिए, ताकि हम आने वाले कल में स्वर्ग के सुंदर चित्रों को उकेर सकें।उन्होंने गुस्सा करने से बचने की सलाह देते हुए कहा कि गुस्सा करने से नरक का द्वार खुलता है।अगर आप बुजुर्ग हैं तो गुस्सा बंद करें और जवान हैं तो गुस्से को बंद करें। याद रखें, सिकंदर बन कर पूरी दुनिया को जीतना सरल है, पर महावीर बन कर अपने क्रोध और कषाय को जीतना सबसे बड़ी विजय है। अगर हम अपनी ह्युमन लाइफ को हैवन लाइफ बनाना चाहते हैं तो हमें 3 एच को सदा ठीक रखना चाहिए -हैड, हार्ट एंड हैंड। केवल पढ़ाई में ऊंचे अंक हासिल कर लेना या बहुत सारे रुपए कमा लेना ही सफलता नहीं है, वरन विपरीत वातावरण में धैर्य और शांति बनाए रखना भी बहुत बड़ी जीवन की सफलता है। गुस्सा आने पर चिल्लाने में जितनी ताकत लगती है, उससे 10 गुना ताकत चुप रहने में लगानी पड़ती है। हम माइंड से गर्मी हटाएं और नरमी बढ़ाने की कोशिश करें। जैसे गरम सूर्य को कोई नहीं देखता, वैसे ही गर्म इंसान को कोई पसंद नहीं करता है।

संत प्रवर ने मेडिटेशन करने की सलाह देते हुए कहा कि अगर हम अपने माइंड को कंट्रोल में करना चाहते हैं तो रोज 20 मिनट मेडिटेशन अवश्य करें। मंकी माइंड को डिवाइन माइंड बनाने की दवा है मेडिटेशन। अगर हम मेडिटेशन का निरंतर अभ्यास करेंगे तो हमें साल में केवल तीन दफा गुस्सा आएगा, पर हम मेडिटेशन नहीं करेंगे तो साल में 365 दफा गुस्सा आता रहेगा।उन्होंने जीवन में मुस्कान बढ़ाने की सीख देते हुए कहा कि अगर गुस्से को मारना है तो मुस्कान को बढ़ाएं। जैसे-जैसे मुस्कान आएगी, वैसे-वैसे गुस्सा विदा होता चला जाएगा। गुस्से से जहां हमारी स्मरण शक्ति और भाग्य शक्ति कमजोर हो जाती है, वहीं मुस्कान से हमारे जीवन की खुशियां 100 गुना बढ़ जाती है। मुस्कुराता हुआ इंसान सबको प्यारा लगता है और गुस्से से भरा इंसान सबको गंवार लगता है। हम उस चेहरे के इंसान बनें, जिसे देख कर सबके दिलों में हंसी और खुशी बढ़ जाए।

संतप्रवर ने प्रेम हमारी साधना है, प्रेम हमारा मंत्र है। जो भी भरा है प्रेम से, वही हमारा संत है...भजन गुनगुनाया तो सभी भाई बहनों का हृदय प्रेम से भर उठा। इस दौरान संतप्रवर ने तीसरे नेत्र को जाग्रत करने के लिए सरल ध्यान का प्रयोग करवाया।इससे पूर्व मुनि शांतिप्रिय सागर ने आरोग्य और मस्तिष्क की सुप्त शक्तियों को जाग्रत करने के लिए पावर योग और प्राणायाम के प्रयोगों का प्रशिक्षण दिया। सह कोषाध्यक्ष देवेंद्र गेलड़ा ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में संयोजक उम्मेदसिंह भंसाली ने आभार जताया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।



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