जोधपुर.
राजस्थान हाईकोर्ट (rajasthan highcourt) ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय में कहा कि पराक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 (Negotiable instruments act 1881) की धारा 143 ए के तहत संशोधन से पूर्व पेश परिवाद में 20 फीसदी अंतरिम राहत का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
न्यायाधीश मनोज कुमार गर्ग ने एक आपराधिक विविध याचिका मंजूर करते हुए एनआइए कोर्ट संख्या 6 जोधपुर महानगर (NIA Court Number 6 Jodhpur Metropolis) के 10 जून के उस आदेश को अपास्त कर दिया जिसमें उन्होंने अप्रार्थी को बतौर अंतरिम राहत 1 लाख, 50 हजार रुपए अदा करने को कहा था।
कोजाराम पटेल ने अधिवक्ता दिनेश चौधरी के माध्यम से आपराधिक विविध याचिका दायर कर कहा कि बकताराम ने प्रार्थी के खिलाफ एनआइ एक्ट में 20 दिसंबर, 2017 को परिवाद दायर कहा कि कोजाराम ने उसे बीस लाख रुपए का चेक दिया था, वह अनादरित हो गया है।
इसलिए उसे 20 फीसदी अंतरिम राहत दिलाई जाए। अधीनस्थ न्यायालय ने गत 10 जून को प्रार्थी को निर्देश दिया कि 2 माह में परिवादी को बतौर अंतरिम राहत 1 लाख, 50 हजार रुपए अदा करे।
अधिवक्ता चौधरी ने बहस करते हुए कहा कि पराक्राम्य लिखत अधिनियम में चेक अनादरण के मामलों में 20 फीसदी तक अंतरिम राहत देने के उद्देश्य से धारा 143 ए जोड़ी गई है। लेकिन इसकी प्रभावी तिथि 1 सितंबर 2018 है।
उन्होंने कहा कि परिवादी ने इससे काफी पहले ही 20 दिसंबर, 2017 को परिवाद दायर कर दिया था। पुराने परिवाद में संशोधन अधिनियम लागू नहीं किया जा सकता है।
एकलपीठ ने याचिका मंजूर कर अधीनस्थ न्यायालय के आदेश को अपास्त घोषित करते हुए कहा कि संशोधित अधिनियम को पूर्वगामी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता है, बल्कि यह पश्चातवर्ती प्रभाव से लागू होगा।
from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/2NFLwWE
0 comments:
Post a Comment