जोधपुर. मेहरानगढ़ दुखांतिका ( mehrangarh stampede 2008 ) की जांच के लिए गठित जसराज चौपड़ा आयोग ( justice jasraj chopra committee ) की रिपोर्ट को लेकर राज्य सरकार ( Rajasthan Government ) के रुख में पांच सालों के भीतर गंभीर विरोधाभास सामने आया है। राज्य सरकार ने मंगलवार को राजस्थान हाईकोर्ट में कहा, आयोग के गठन की प्रकृति ऐसी है कि इसकी रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर रखने की आवश्यकता नहीं है। जबकि पांच साल पहले सरकार ने ही विधानसभा में एक सवाल के जवाब में स्वीकार किया था कि चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखने की कार्यवाही प्रक्रियाधीन है।
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि सरकार ने हाईकोर्ट में गलत तथ्य रखा या विधानसभा में? 14 वीं विधानसभा के पहले सत्र में चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट को लेकर पूछे गए सवाल पर राज्य की तत्कालीन सरकार ने जोधपुर शहर के तत्कालीन विधायक कैलाश भंसाली को जवाब दिया था कि मेहरानगढ़ दुखांतिका की जांच के लिए 2 अक्टूबर 2010 को कमीशन ऑफ इंन्क्वायरी एक्ट के तहत जस्टिस जसराज चौपड़ा आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग के कार्यकाल को 11 बार बढ़ाया गया। आयोग ने 5 मई 2011 को रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी।
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आयोग पर सरकार ने 196.44 लाख रुपए खर्च किए। गृह विभाग की ओर से दिए जवाब में यह भी कहा कि चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट राज्य विधानसभा के पटल पर रखने की कार्यवाही प्रक्रियाधीन है। विधानसभा में दिए जवाब से साफ था कि पांच साल पहले सरकार रिपोर्ट विधानसभा में रखने को तैयार थी और तब रिपोर्ट विधानसभा में नहीं रखने की कोई बात नहीं कही थी, लेकिन मंगलवार को सरकार ने अपने पूर्ववर्ती रुख से यू-टर्न कर लिया।
और एकदम पलट गई सरकार
राज्य कैबिनेट के निर्णय के हवाले से सरकार ने अब हाईकोर्ट में अतिरिक्त शपथ पत्र पेश कर बताया कि चौपड़ा जांच आयोग का गठन एक प्रशासनिक निर्णय था। इस संबंध में न तो विधानसभा में कोई प्रस्ताव पारित हुआ था और न ही मंत्रिमंडल की कोई आज्ञा जारी की गई थी। इसलिए इस आयोग का गठन कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट की धारा 3(1) के अंतर्गत नहीं माना जा सकता। कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट की धारा 11 में राज्य सरकार को प्रशासनिक स्तर पर जांच आयोग गठित करने का अधिकार है। चौपड़ा आयोग का गठन भी एक प्रशासनिक निर्णय था। एक्ट की धारा (4) के अनुसार केवल धारा 3 (1) के अंतर्गत गठित आयोग के लिए ही यह अनिवार्य है कि उसका प्रतिवेदन एवं की गई कार्यवाही को विधानसभा के पटल पर रखा जाए।
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चौपड़ा आयोग को इस धारा के तहत गठित होना नहीं माना गया है, लिहाजा इसकी रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा जाना आवश्यक नहीं। इसके गठन की अधिसूचना में भी धारा (4) का प्रावधान नहीं जोड़ा गया था। हालांकि, आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने को लेकर सरकार ने एक और तर्क दिया है कि इससे कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है, लेकिन इसके बावजूद इस विरोधाभास से परदा नहीं उठता कि सरकार ने पांच साल पहले किस आधार पर विधानसभा में कहा था कि चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट सदन के पटल पर रखने की कार्यवाही प्रक्रियाधीन है।
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