Gajendra dahiya/जोधपुर. हर साल सर्दियों की शुरुआत में राजधानी दिल्ली में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के खेतों में पराली जलाने से उत्पन्न भयंकर प्रदूषण से निपटने के लिए जोधपुर के केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के वैज्ञानिक ने नई तकनीक विकसित की है। वैज्ञानिकों ने लैब में भूसी पर विशेष कवक की मदद से सेक्रीफिकेशन से एल्कोहल प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है। इसे बायो फ्यूल के तौर पर पेट्रोल में मिलाया जा सकेगा। काजरी अब इस तकनीक को सस्ती करने पर शोध कर रही है।
काजरी की वैज्ञानिक एम. सरिता ने दिल्ली में अनुसंधान के दौरान चावल की भूसी से शक्कर व एथिल एल्कोहल प्राप्त किया। प्रयोग में चावल की पूसा सुगंध-5 प्रजाति काम में ली गई। चावल व गेहूं की भूसी को क्रमश: 1.42 और 1.58 के अनुपात में लेकर उसे बारीक पीसा और एक प्रतिशत सोडियम हाइड्रोक्साइड के साथ धोया गया। उसके बाद उसमें एसपरजिलस टेररस सीएम-20 कवक की मदद से ग्लूकोसाइड हाइड्रोलाइसिस किया गया। इस क्रिया के दौरान क्रूड एंजाइम ने भूसी के सेलुलोज में मौजूद मोनोमरिक शुगर को एथेनॉल में परिवर्तित कर दिया। अब इस प्रयोग को प्रयोगशाला से औद्योगिक स्तर पर किया जाएगा। इसके लिए भूसी को इकठ्ठा करने, उसके परिवहन और ट्रीटमेंट प्लांट की जरूरत पड़ेगी। इस सफलता पर केंद्र सरकार ने सरिता और उनके साथियों को दिल्ली में पुरस्कृत भी किया था।
10 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की अनुमति
पेट्रोलियम मंत्रालय ने पेट्रोल में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिलाकर बेचने की अनुमति प्रदान कर रखी है लेकिन राजस्थान में पिछले दो साल से एथेनॉल बंद है। देश में एथेनॉल की खपत अधिक होने और इसका उत्पादन कम होने से शुद्ध पेट्रोल बेचना पड़ता है। भूसी से एथेनॉल के उत्पादन से प्रदूषण की समस्या से निजात मिलने के साथ तेल के आयात में कमी आने से विदेशी मुद्रा में भी बचत होगी।
वायुसेना भी बायो फ्यूल की तरफ
बायो फ्यूल से वायुसेना ने भी पहली बार अपना ट्रांसपोर्ट विमान एएन-32 उड़ाया जो इस साल गणतंत्र दिवस की फ्लाई पास्ट में भी शामिल हुआ था।
गैस चैम्बर बन जाती है दिल्ली
काजरी का यह प्रयोग देश की राजधानी दिल्ली के लिए वरदान साबित हो सकता है। खरीफ की फसल लेने के बाद पंजाब और हरियाणा के किसान खेतों में बची भूसी या पराली को जला देते हैं। अकेले पंजाब में 22 से 23 मिलियन टन पराली पैदा होती है। पंजाब के रिमोट सेंसिंग डाटा के मुताबिक पिछले साल 27 सितम्बर से लेकर 9 नवम्बर तक 40 हजार 510 स्थानों पर आग की घटनाएं रिपोर्ट की गई। इनसे निकलने वाला धुंआ आगे दिल्ली में पहुंचकर उसको गैस चैम्बर में तब्दील कर देता है। पिछले साल ही दिल्ली में धूल कणों यानी पीएम (पार्टिकुलेट मैटर) 2.5 की मात्रा 1000 तक पहुंच गई थी जो अनुमति स्तर से 16 गुणा तक अधिक थी।
बायो फ्यूल से होगी तरक्की
‘बायो फ्यूल के उत्पादन से प्रदूषण से निजात मिलने के साथ आर्थिक प्रगति भी होगी। अब इस प्रक्रिया को मितव्ययी करने के प्रयास किए जाएंगे।
डॉ. ओपी यादव, निदेशक, काजरी जोधपुर
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