पहली बार किसी वैज्ञानिक ने कहा- ग्लोबल वार्मिंग से घबराओ मत, फायदा उठाओ

पोस्ट पसंद आये तो लाइक जरुर करे ?

गजेंद्रसिंह दहिया/जोधपुर. संभवत: ऐसा पहला मौका होगा जब किसी वैज्ञानिक ने ग्लोबल वार्मिंग से घबराने की बजाय वैज्ञानिक समुदाय को फायदा उठाने की सलाह दी है। केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुंसधान संस्थान (काजरी) के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. अमलकर ने मौसम के मॉडल व शोध के आधार पर बताया कि थार मरुस्थल सहित उत्तरी गोलाद्र्ध में कई स्थानों पर हवा का दबाव कम हो गया है। पश्चिमी राजस्थान में पिछले 50 साल में हवा की गति आधी रह गई है। इससे प्री मानसून की बरसात होने की बजाय पश्चिमी विक्षोभों से मई में ही बौछारें गिर रही हैं, जिससे मवेशियों के लिए चारागाह विकसित करने का स्वर्णिम अवसर सामने है। हवा की गति आधी रहने से बालू का री-एक्टिवेशन बंद हो गया है। इससे भूमि की नमी बरकरार रहती है। इससे सिंचाई हो रही है।

अरब सागर में अधिक बरसात, घूम रही हवा
शुष्क भूमि विकास के लिए जोधपुर में आयोजित चार दिवसीय विश्व की 13वीं अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस के दूसरे दिन मंगलवार को डॉ. अमलकर ने बताया कि भारत की भूमि पर केरल में मई के प्रथम सप्ताह में दक्षिणी-पश्चिमी मानूसन के प्रवेश के साथ ही यह अरब सागरीय शाखा व बंगाल की खाड़ी शाखा में बंट जाता है। ग्लोबल वार्मिंग से अरब सागर में मानसून से अधिक बरसात हो रही है। इससे राजस्थान को प्राप्त होने वाली प्री मानसून बरसात कम हो गई है। साथ ही अरब सागर में ही हवा के घूमने से मार्च से जून तक राजस्थान में 20 से 30 किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से चलने वाली हवा अब 10 से 15 किमी/घण्टा तक सीमित रह गई है।

मानसून को घुसने नहीं देता पश्चिमी विक्षोभ

गर्मियों में पश्चिमी विक्षोभों की संख्या बढऩे से यह मई-जून में राजस्थान में प्रवेश कर रहे मानसून के सामने आ जाता है। इससे मानसून की पहली बरसात जुलाई तक दूसरे पखवाड़े में शिफ्ट हो गई। बरसात उतनी ही हो रही लेकिन 10 दिन का पानी 5 दिन में ही बरस रहा है।

दूसरे दिन जलवायु परिवर्तन पर कई सत्र
सम्मेलन के दूसरे दिन शुष्कभूमि में खेती से संबंधित विभिन्न चुनौतियों पर चर्चा हुई। अन्तरराष्ट्रीय संस्थान, जलवायु परिवर्तन, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा, दक्षिणी एशिया के निदेशक डॉ पीके अग्रवाल ने प्रमुख खाद्य फ सलों गेहूं, चावल, मक्का आदि पर बदलते हुए जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर बल देते हुए जलवायु आधारित कृषि पद्धति को अपनाने पर जोर दिया। जापान स्थित टटोरी विश्वविद्यालय के प्रो. हिसाशी सुजीमोतो ने शुष्क एवं गर्म जलवायु के लिए विकसित की गई गेहूं की किस्मों के बारे में जानकारी दी। बायोवर्सिटी इन्टरनेशनल के डा. रिचर्ड चाइना ने शुष्क क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियों एवं उष्टकटिबंधीय क्षेत्रों के लिए फ सलों की किस्मों के विकास पर चर्चा की। अंतरराष्ट्रीय जल प्रबन्धन संस्थान की महानिदेशिका डा. क्लोडिया सदोफ ने भूमिगत जल संक्षरण, जल संसाधनों के उपयोग एवं उनसे संबंधित विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर चर्चा की।

इस तरह समझें ग्लोबल वार्मिंग के फायदों को

- दुष्प्रभाव : थार मरुस्थल में 50 साल में हवा की गति आधी हुई, फायदा : कई एकड़ भूमि सूखी होने से बची

- दुष्प्रभाव : पश्चिमी विक्षोभ से मई में होने लगी बरसात, फायदा : चारागाह विकसित करने का स्वर्णिम अवसर

- दुष्प्रभाव : हवा का दबाव कम, फायदा : नहरों में वाष्पीकरण बचा



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal http://bit.ly/2TM1nDf
Share on Google Plus

About Atul

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.

0 comments:

Post a Comment