अभिषेक बिस्सा/जोधपुर. शहर में बेघरों के रात्रि विश्राम के लिए नगर निगम की ओर से संचालित आश्रय स्थलों के हाल बेहाल हैं। दीनदयाल अन्त्योदय योजना राष्ट्रीय शहरी आजिविका मिशन के तहत स्थापित कई आश्रय स्थलों पर तैनात कार्मिक नजर नहीं आते तो कई आश्रय स्थल खाली पड़े हैं। पत्रिका एक्सपोज टीम ने मंगलवार रात कुछ आश्रय स्थलों का जायजा लिया। इस दौरान आश्रय स्थल के व्यवस्थाओं की पोल खुलती नजर आई।
निगम की ओर से आखलिया चौराहा क्षेत्रम ें बंगाली क्वार्टर काली माता मंदिर के पास, कबीर नगर वार्ड संख्या 12, प्रथम पुलिया चौपासनी हाउसिंग बोर्ड, मंडोर गार्डन के सामने सुलभ के ऊपर, नशा मुक्ति केन्द्र मगरा-पूंजला, सरस्वती नगर एसएलएमआर स्टेशन के पास, पीली टंकी भगत की कोठी, पुराना स्टेडियम के पास और महात्मा गांधी मोर्चरी के पास आश्रय स्थल स्थापित किए हैं।
पुराना स्टेडियम के पास बने आश्रय स्थल में रात को कमठे का काम करने मध्यप्रदेश से आए मजदूर सोते नजर आए। मजदूरों ने बताया कि वे पिछले चार-पांच दिनों से छोटा कमरा ढूंढ़ रहे हैं, लेकिन उन्हें रहने की जगह नहीं मिली। इस कारण वे यहां रुके हैं। आश्रय स्थल के बाहर फुटपाथ पर भीख मांगने वाला परिवार नजर आया। इस परिवार के मुखिया ने बताया कि आश्रय स्थल में नशेडिय़ों का जमघट होने के कारण वे अपने परिवार की महिलाओं के साथ आश्रय स्थल में नहीं सो नहीं। इस आश्रय स्थल में महज चार-पांच लोग सो रहे थे और यहां तैनात कर्मचारी गायब था। प्रभारी धर्मेन्द्र जावा ने बताया कि यहां शिफ्टि में कर्मचारी लगाए जाते हैं। इस समय यहां श्याम की ड्यूटी है। पत्रिका ने उन्हें बताया कि मौके पर कोई नहीं है, तो प्रभारी ने कहा कि अभी पता करके बताते हैं।
रेलवे स्टेशन का आश्रय स्थल खाली नजर आया। यहां रजाई वाले स्थान पर एक बल्ब लगा था। लेकिन पूरे आश्रय स्थल में अंधेरा छाया हुआ था। एक्सपोज टीम ने मौके से प्रभारी राजेन्द्र को फोन लगाया और पूछा गया कि यहां कोई कर्मचारी क्यों नहीं है। इस पर उन्होंने कहा कि नंदकिशोर की ड्यूटी है, अभी आ जाएगा। यह पूछने पर कि आश्रय स्थल में अंधेरा क्यों हैं? क्या रात को कोई विश्राम करने नहीं आता? इस पर राजेन्द्र ने जवाब दिया कि यहां ज्यादातर भिखारी व नशेड़ी आते हंैं। पास में रेलवे स्टेशन है। कभी कभार कोई घंटे-दो घंटे के लिए विश्राम करने आता है और फिर आगे चला जाता है।
महिलाओं के लिए अलग बसेरे की दरकार
ज्यादातर बसेरों में नशेड़ी लोगों का डेरा रहता है। ऐसे में फुटपाथ पर रहने वाले परिवार रैन बसेरे में नहीं आते। कई महिलाएं फुटपाथ पर सोती हंैं। इन हालातों में महिलाओं के लिए अलग से आश्रय स्थल बनाए जाने की दरकार है। आसपास बने केबिन संचालकों का कहना है कि कई लोग जानबूझकर सडक़ पर सोते हैं। इन लोगों को दानदाता खाद्य सामग्री, गर्म कपड़े या कंबल दे जाते हैं। कई लोग नि:शुल्क मिली सामग्री बाजार में बेच देते हैं।
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