फलोदी (जोधपुर) . खींचन में कुरजां को इतना नजदीक से देखना बेहतरीन प्राकृतिक सौन्दर्य का अहसास है। हालांकि खीचन में शीतकालीन प्रवास पर आने वाले डेमोसाइल क्रैन अब तक संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची से बाहर है, लेकिन इनका संरक्षण जरूरी है।
एेसे में यहां कुरजां के प्राकृतिक आवास में उनकी जरूरतें और उनकी समस्याओं पर शोध करने के लिए इंटरनेशनल क्रैन फाउण्डेशन द्वारा प्रोजेक्ट तैयार किया जाना है। यह बात पिछले दिनों खीचन आए फाउण्डेशन के सारस स्कैप कार्यक्रम के निदेशक डॉ. के.एस. गोपी सुन्दर ने पत्रिका से खास बातचीत कही।
डॉ. के.एस. गोपी सुन्दर ने कहा कि कुरजां का शीतकीन प्रवास स्थल खीचन शोध की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। कुरजां को खीचन में विचरण करता देखा जाना, यहां सामाजिक संरक्षण का बेहतरीन उदाहरण है। ये पक्षी जहां भी जहां भी जाते हैं, अपने मनमोहक अंदाज और आवाज से लोगों को अपने साथ जोड़ लेते हैं।
डॉ. सुन्दर ने कहा कि राजस्थान का यह इलाका शुष्क क्षेत्र है तथा प्रवासी पक्षी कुरजां शुष्क क्षेत्र ही पसंद करते है। जिसका नतीजा है कि आज यहां हजारों की तादाद में कुरजां पक्षियों की अठखेलियां देखने को मिलती है और क्षेत्र को विश्व स्तर पर पहचान मिली है। एेसे में सबसे पहले तो क्षेत्र के प्राकृतिक आवासों का संरक्षण जरूरी है। साथ ही इन आवासों का विकास कुरजां के हिसाब से हो, न कि पयर्टन के हिसाब से। ताकि पक्षी खुद को महफूज महसूस करे।
कुरजां पर होगा शोध
डॉ. सुन्दर ने बताया कि इंटरनेशनल क्रैन फाउण्डेशन द्वारा यहां कुरजां की जरूरतों व समस्याओं पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लम्बे समय तक अनुसंधान किया जाएगा। साथ ही कुरजां के स्वच्छंद विचरण को प्रभावित करने वाले मुख्य विक्षोभ के कारणों पर भी शोध होगा। जिसमें स्थानीय लोगों से बातचीत भी की जाएगी। वहीं दूसरी तरफ भविष्य में कुरजां के प्रवसन मार्गों व अन्य विषयों पर शोध के लिए भी यहां काफी संभावनाएं है।
from Patrika : India's Leading Hindi News Portal http://bit.ly/2Rq9ZkN
0 comments:
Post a Comment