नंदकिशोर सारस्वत/जोधपुर. थार के रेगिस्तान में लुप्त हो चुके एशियाई चीते के पुनर्वास का प्रोजेक्ट भले ही सरकारों के बदलने से आठ साल पहले ठंडे बस्ते में चला गया हो लेकिन 20 दिसम्बर को नर पैंथर ने उसी जगह दस्तक दी है जिसे चीते के पुनर्वास के लिए विशेषज्ञों ने सर्वाधिक उपयुक्त बताया था। जैसलमेर जिले के सीमावर्ती क्षेत्र शाहगढ़ बल्ज के रेगिस्तानी क्षेत्र में पैंथर की दस्तक ने थार में नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन डॉ. एमके रंजीतसिंह ने आठ साल पहले रिपोर्ट में कहा था कि जैसलमेर का शाहगढ़ बल्ज का करीब 8 हजार वर्ग किमी क्षेत्र (150 किमी लंबा भू भाग) चीते के लिए सर्वाधिक अनुकूल है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यदि थार के शाहगढ़ क्षेत्र में पैंथर विचरण करता है तो मरुस्थलीय खाद्य शृंखला और काला हरिण, चिन्कारा जैसे मरुस्थलीय वन्यजीवों के संरक्षण तथा डेजर्ट ईको सिस्टम को संतुलित करने में सहयोग मिल सकता है।
यूं शुरू और बंद हुआ चीता पुनर्वास प्रोजेक्ट
अगस्त 2009 में भारत सरकार ने भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून को चीतों के भारत में पुनर्वास का प्रोजेक्ट सौपा था। वर्ष 2010 में भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून और वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की टीम ने राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व छतीसगढ़ के 10 लैंडस्केप में चीता के पुनर्वास के लिए प्राकृतिक आवास स्थलों का सर्वे किया। सर्वे में चीता के लिए अनुकूल आवास स्थलों में उपलब्ध आहार के रूप में खाने योग्य जानवर, वनस्पति तथा क्षेत्रवासियों के व्यवहार आदि जानकारी एकत्र कर रिपोर्ट तैयार की गई। रिपोर्ट के अनुसार चीते के लिए राजस्थान के जैसलमेर बॉर्डर का इलाका शाहगढ़ बल्ज और मध्य प्रदेश के कुनो पालपुर और नौरादेही अभ्यारण्य में चीते को दोबारा बसाने के लिए पूरी तरह उपयुक्त स्थल बताया गया। चीते को अफ्रीका, ईरान और मध्य पू्र्व से भारत में आयात किया जाना प्रस्तावित था, लेकिन सरकारों के बदलने के साथ ही इस विलुप्त कैट प्रजाति का भारत में पुनर्वास का प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चला गया।
सरकार करे पहल
पश्चिमी राजस्थान में इन्दिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र में वर्षों से किए गए पौधारोपण के फ लने फूलने से मुख्य नहर के दोनों तरफ घना जंगल विकसित हो रहा है। हनुमानगढ़ से रामगढ़ (जैसलमेर) तक जंगली सूअर, चिंकारा, नीलगाय जैसे वन्यजीवों की भी अच्छी तादाद है। थार में 20 दिसम्बर को तेंदुए का दिखाई देना और कुछ दिनों से वहां रहना और किसी प्रकार की जनहानि नहीं पहुंचाना एक अच्छा संकेत है। तेंदुआ वन्यजीवन में आहार शृंखला के उच्च स्तर पर आसीन है और राजस्थान का यह सबसे कम आबादी का क्षेत्र है। इसको मद्देनजर रखते हुए इस क्षेत्र में तेंदुआ संरक्षण पर सरकार को पहल करनी चाहिए।
डॉ. सुमित डूकिया, वन्यजीव विशेषज्ञ
ईको टूरिज्म की नई संभावनाएं
पिछले 7-8 साल में करीब 18 पैंथर के थार के नजदीकी रिहायशी इलाकों में पहुंचना इस बात का संकेत है कि थार का क्षेत्र उन्हें रास आ रहा है। पैंथर इस बार थार के सीमावर्ती क्षेत्र तक पहुंचा है। राज्य सरकार को इस अति महत्वपूर्ण विषय पर संज्ञान लेते हुए वन अधिकारियों को क्षेत्र के निवासियों के साथ बैठक आयोजित कर उन्हें विश्वास दिलाना चाहिए कि पैंथर एवं उनके मवेशी साथ रह सकते हैं। यदि पैंथर कोई मवेशी मारता है तो वनविभाग उचित मुआवजा प्रदान करेगा। इस तरह की बैठक से क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण के साथ ईको टूरिज्म की संभावनाएं बढऩे से रोजगार के नए अवसर सुलभ हो सकेंगे।
डॉ. हेमसिंह गहलोत, वन्यजीव विशेषज्ञ
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