जोधपुर. सरकारी स्कूल के बच्चों के पोषण के लिए शुरू की गई अन्नपूर्णा दूध योजना और ‘मिड डे मील’ कार्यक्रम जारी रखने की चिंता में कई शिक्षकों का वजन घट रहा है। कारण दूध और पोषाहार के लिए समय पर बजट नहीं मिलना है। बजट के अभाव में कई शिक्षक जेब से पैसे खर्च कर स्कूली बच्चों के लिए दूध और पोषाहार का इंतजाम कर रहे हैं।
राज्य सरकार की ओर से दो जुलाई से जोरशोर से शुरू की गई अन्नपूर्णा दूध योजना करीब ढाई माह में ही लडखड़़ाने लगी है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्र की कई स्कूलों में अन्नपूर्णा दूध योजना का बजट समय पर नहीं पहुंच रहा। किसी स्कूल का एक तो किसी का दो माह का बिल बकाया है। ग्रामीण क्षेत्र की कई स्कूलों को पांच माह से पोषाहार का बजट जारी नहीं हुआ है। उस पर मुसीबत यह कि पोषाहार बनाने वाले कुक कम हेल्पर का मानदेय भी बकाया चल रहा है।
जेब से पैसे देकर मंगवा रहे दूध
प्रारंभिक शिक्षा के अधीन स्कूलों के शिक्षक कुछ ज्यादा ही परेशान हैं। एक तो अन्नपूर्णा दूध योजना शुरू होने के बाद काम वैसे ही बढ़ गया है। दूसरी मुसीबत यह कि स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नहीं हैं।
शहरी स्कूलों में शिक्षक खुद की जेब से दूध ला रहे हैं और खुद ही गर्म कर बच्चों को पिला रहे हैं। वजह यह है कि शिक्षा विभाग की ओर से निर्धारित मानदेय में शहरों में कुक कम हेल्पर नहीं मिल रहे। इसके चलते एक शिक्षक के हर दिन कम से कम एक से दो घंटे दूध गर्म करने और बच्चों को पिलाने में बीत जाते हैं। शहरी स्कूलों में पोषाहार सेंट्रल किचन से आता है।
दोषी अधिकारियों के विरुद्ध हो कार्यवाही
‘बजट के अभाव में अन्नपूर्णा दूध और पोषाहार जैसी महत्वपूर्ण योजना के संचालन में परेशानी आ रही है। इसके लिए शीघ्र बजट जारी कर दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए।
लक्ष्मणदान चारण, जिलाध्यक्ष राजस्थान शिक्षक एवं पंचायतीराज कर्मचारी संघ।
बिल दो, बजट लो
‘जिनके बिल बाकी हैं, उन स्कूलों का बजट जारी नहीं हुआ। बिल स्कूल से ब्लॉक कार्यालय और ब्लॉक से हमारे पास आता है। हम जिला कलक्टर के हस्ताक्षर करवाकर बिल आगे भेजते हैं। इसके बाद ही बजट जारी होता है।
धर्मेन्द्र कुमार जोशी, डीईओ मुख्यालय प्रारंभिक
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