बच्चों में बहरेपन का इलाज समय पर जरूरी

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जोधपुर.
गर्भस्थ शिशु को बहरेपन से बचाने के लिए मां को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। जिसमें तेज ध्वनि से बचना बेहद जरूरी है। इसके अलावा मां को किसी प्रकार के तम्बाकू या नशे की चीजें सेवन नहीं करने चाहिए। क्योंकि इससे बच्चों में बहरपेन की समस्या तेजी से सामने आने लगी है। इस तरह की चर्चा शुक्रवार को एम्स में आयोजित जन-जागरूकता कार्यशाला-बहरेपन से बचाव की ओर कदम में हुई।
कार्यशाला में विशेषज्ञ पैनल एम्स ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. अमित गोयल, पिडियाट्रिक्स व जेनेटिक विशेषज्ञ डॉ. कुलदीपसिंह, डॉ. स्नेहा अंबवानी, डॉ. पंकज राघव ने जिज्ञासु प्रतिभागियों के सवालों के जवाब दिए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विक्रमसिंह ने किया। वर्कशॉप मेंं विशेषज्ञों ने बताया कि कुछ बच्चे तो जन्म से ही बहरेपन के शिकार होते हैं और कुछ में बाद में बहरेपन के लक्षण आ जाते हैं। विशेषज्ञ पैनल ने ऐसे बच्चों का इलाज समय पर ही करा दिया जाएं तो बाद की कई तरह की परेशानियों से बचा जा सकता है। बच्चों में बहरेपन की समस्या क्यों बढ़ रही हैं, बच्चा गर्भ में हों तब मां को किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, बहरेपन की पहचान कैसे की जा सकती है, पहचान होने के बाद बहरेपन हटाने के लिए क्या किया जाना चाहिए, के बारे में विशेष जानकारी दी।


बहरेपन के कारण-
-गर्भावस्था के दौरान तम्बाकू या सिगरेट या अन्य किसी नशे का सेवन करना।
-मां को डायबिटिज, ब्लड प्रेशर की बीमारी होने पर भी गर्भस्थ शिशु के श्रवण शक्ति पर प्रभाव पड़ सकता है।
-मां व पिता के अलग-अलग ब्लड गु्रप से होने से भी गर्भस्थ शिशु में बहरेपन के लक्षण आ सकते हैं।
-नवजात के जन्म लेते ही नहीं रोना भी बहरेपन के संकेत है।


यह सावधानी जरूरी-
-बच्चों में बहरेपन के लक्षण आने पर कान में कुछ भी तरल पदार्थ नहीं डालें।
-ईएनटी विशेषज्ञ से परामर्श के बगैर बच्चे को कुछ भी दवा नहीं दें।
-जहां पर भी अत्यधिक शोरगुल हो रहा है, बच्चे को उससे बचाना जरूरी है


चर्चा उपयोगी, लेकिन सुनने वाले बहुत कम-
दौड़भाग भरी जिन्दगी और तेज ध्वनि के प्रदूषण के कारण बहरेपन व श्रवण शक्ति कम होने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे समय में एम्स में जन-जागरूकता के लिए कार्यशाला आयोजित कर बहुत अच्छी चर्चा की गई, लेकिन कार्यशाला को लेकर व्यापक प्रसार-प्रचार नहीं होने के कारण उसमें बाहर के लोग नहीं आ पाएं, जिन्हें लाभान्वित किया जाना था। कार्यशाला में एम्स की फैकल्टी और कुछ सीनियर स्टूडेंट ने ही भाग लिया।



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