जोधपुर.
पाल रोड निवासी जितेंद्र और धर्मिष्ठा की मई २००९ में शादी हुई। दोनों के एक बेटा हुआ। बाद में दोनों के बीच तनाव इतना बढ़ा की मामला तलाक तक आ गया। दो वर्ष से दोनों तलाक का मुकदमा लड़ रहे थे। लेकिन शनिवार का दिन इस परिवार की खुशियां लौटा गया। फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश ने दोनों को समझाते हुए कहा कि कोई भी निर्णय लेने से पहले पति-पत्नी अपने पुत्र के भविष्य के बारे में भी सोचें। इस बात का असर हुआ। जितेंद्र और धर्मिष्ठा ने अपने मासूम बेटे दक्ष को देखा और गिले-शिकवे भुलाकर फिर से एक हो गए। पारिवारिक न्यायालय के कर्मचारियों ने तुरंत वरमाला मंगवाई और पति-पत्नी एक दूसरे को माला पहन कर कोर्ट से विदा हुए। इससे पहले अदालत में उपस्थित परिवार के सदस्यों ने सभी को मिठाई खिला कर मुंह मीठा कराया।
सूंथला निवासी रणजीत और लालसागर निवासी मोनालिसा के मामले का अंत भी सुखद रहा। दोनों का विवाह 27 फरवरी 2017 को हुआ। शादी के तीन माह बाद ही मनमुटाव और गलतफहमी के कारण पति ने कोर्ट में तलाक का मुकदमा लगा दिया। शनिवार को आयोजित लोक अदालत के दौरान पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीश साहबराम मोटयार ने दोनों को पास बैठाकर बात की। पति ने कहा पत्नी बिना बताए बाहर चली जाती है तो पत्नी ने कहा कि नणद टोका-टाकी करती है। न्यायाधीश ने समझाया कि ससुराल में ही पीहर जैसा माहौल बना दिया जाए तो पत्नी घर छोडक़र जाएगी ही नहीं। इस समझाइश में लोक अदालत के लिए नियुक्त अधिवक्ता राजेंद्र दाधिच तथा परिवादी के अधिवक्ता आरएस बाघेला ने भी योगदान दिया। फैमिली कोर्ट में करीब आधा दर्जन दम्पत्तियों का पुनर्मिलन आपसी सहमति से हुआ। इस दौरान अदालत का माहौल भावुक हो गया।
ये फिर भी नहीं माने
लोक अदालत के दौरान एक मामला ऐसा भी आया जिसमें तलाकशुदा महिला और पुरुष ने आपस में दूसरी शादी की। लेकिन आपसी विवाद के चलते दोनों ने साथ रहने से इनकार कर दिया और फिर तलाक की अर्जी लगा दी। न्यायालय ने दोनों को समझाने का खूब प्रयास किया लेकिन समझौता नहीं हो सका। मामला फिर से नियमित कोर्ट में चलेगा।
एक अन्य मामले में अधीनस्थ न्यायालय में कार्यरत एक बाबू ने अपनी पत्नी को भरण पोषण तथा पुत्री की शादी के लिए दस लाख देने की पेशकश की, लेकिन पाली निवासी पत्नी ने रकम कम होने का हवाला देते हुए मना कर दिया और मामला अनसुलझा रह गया। अगली पेशी पर दोनों को फिर समझाया जाएगा।
टूटे रिश्ते जोड़ती है लोक अदालत
इससे पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष नरसिंहदास व्यास ने शनिवार को वर्ष २०१८ की तीसरी लोक अदालत की शरुआत की। उन्होंने कहा लोक अदालत के माध्यम से लोगों के टूटे हुए दिल जुड़ जाते हैं और पीढियों में पड़ी दरारें भी भर जाती हैं। लोक अदालत के निर्णय पर अपील नहीं की जा सकती इसलिए इसका निर्णय स्थाई रहता है। आपसी सहमति से कभी हार-जीत नहीं होती। सहमति के आधार पर हुए समाधान से दोनों पक्षों की जीत होती है।
लोक अदालत में विभिन्न तरह के ८२५ से अधिक मुकदमों का राजीनामे से निस्तारण हुआ। ४०० से अधिक प्री लिटिगेशन मामले कोर्ट में आने से पहले सुलझा लिए गए।
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