जयपुर/जोधपुर। पूर्व सांसद और मारवाड़ राजघराने की पूर्व राजमाता कृष्णाकुमारी का सोमवार रात करीब 1.30 बजे निधन हो गया। वे 93 वर्ष की थीं। उन्हें अचानक तबीयत बिगडऩे के बाद निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन से राजस्थान सहित देशभर के राजघरानों और आम जनता में शोक की लहर फैल गई। राजमाता पिछले कई दिनों से अस्वस्थ थीं। राजमाता को पक्षाघात के बाद अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम उनकी देखरेख में जुटी रही। रात करीब 1.30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका दाह संस्कार ‘जसवंत थड़ा‘ समाधि स्थल पर किया जाएगा। मारवाड़ के राजपरिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार मेहरानगढ़ फोर्ट के सामने स्थित जसवंत थड़ा पर किया जाता है। राजमाता कृष्णाकुमारी का अंतिम संस्कार भी यहीं पर होगा। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक समाधि स्थल के बारे में...
मारवाड़ के ताजमहल के नाम से है प्रसिद्ध
अपनी बेगम मुमताज की याद में प्रेम के प्रतीक के रूप में ताजमहल का निर्माण कराया था। वहीं मारवाड़ के एक महाराजा ने अपने पिता की याद को चिरस्थाई रखने के लिए संगमरमर पत्थर से ताजमहल की शैली में ही भव्य इमारत का निर्माण कराया। यही कारण है कि विश्व प्रसिद्ध मेहरानगढ़ फोर्ट के सामने की पहाड़ी पर स्थित जसवंत थड़ा शानदार कारीगरी के कारण मारवाड़ का ताजमहल कहा जाता है।
- थड़ा (सीनोटाफ) का तात्पर्य एक ऐसी समाधि जो केवल स्मारक है, जहां पर सम्बन्धित व्यक्ति का दाह संस्कार किया गया हो। इसे शून्य समाधि भी कहा जाता है। महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय का वर्ष 1895 में निधन होने पर उनका दाह संस्कार जसवंत थड़े के निकट किया गया। इससे पूर्व राजघराने के सदस्यों का अंतिम संस्कार मंडोर में किया जाता था। मंडोर की जोधपुर से दूरी को ध्यान में रख इस स्थान का चयन किया गया।
- उनके पुत्र महाराजा सरदारसिंह ने अपने पिता की याद को चिरस्थाई रखने के लिए इसका निर्माण कराया। यह शून्य समाधि मारवाड़ के लाल पत्थर के पहाड़ के बीच धवल आभा लिए अलग ही नजर आता है। चांदनी रात में इसके वास्तु सौंदर्य में निखार आ जाता है।
- ताजमहल के समान ही इसका निर्माण मकराना के सफेद संगमरमर पत्थर से किया गया। वर्ष 1904 में इसका निर्माण शुरू किया गया। यह वर्ष 2010 में बनकर तैयार हुआ।
- मुख्य भवन के चारों तरफ दीवारों पर पारदर्शी संगमरमर की शिलाए लगी है। इन पत्थरों से होकर रोशनी अंदर पहुंचती है। इसके चारों तरफ दस बड़ी और 28 छोटी छतरियां बनी हुई है। इन छतरियों की बगल में ही राजपर वार के सदस्यों का अंतिम संस्कार किया जाता है। इसका निर्माण ताजमहल निर्माण शैली की तर्ज पर किया हुआ है। मुख्य भवन में जोधपुर के अब तक के सभी महाराजाओं की तस्वीरें लगी है। हर वर्ष दस लाख से अधिक पर्यटक इसे देखने को पहुंचते है। कई फिल्मों की शूटिंग यहां पर हो रखी है।
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