पतली दुबली छरहरी काया की-एक महिला...। साथ में दो छोटे बच्चे। अनुबंध वृद्धजन कुटीर में प्रवेश करती है।
- मैडम नमस्ते...। मेरा नाम....है...। ये दोनों मेरे बच्चे हैं। मैं आपसे कुछ बात करना चाहती हूं।- कहिये...।- एक्चुअली मैडम, मेरी दादी यहां हैं आपके पास काफ ी समय से। ये मुझे कल पता चला...।- पहली बार कोई पोती दादी से मिलने आई है।
-यह देख-सुनकर खुशी हो रही थी।
-कौन हैं आपकी दादी?
- (अपने आपको संभालते हुए) मैडम सच कहंू आपसे जो भी बात है। आपको बता सकती हंू क्या?
- हां-हां, बताओ।
- मैडम, मेरे मम्मी-पापा ने मेरी दादी को बहुत तकलीफें दी। मेरे दादा जल्दी गुजर गए। मैं बहुत छोटी थी तब से देख रही थी, समझ रही थी। धीरे-धीरे सब समझ आने लगा। मैं पहली पोती थी। दादी मुझे बहुत प्यार करती थी। मेरे दो भाई और हुए...। पता नहीं क्यूं..., मम्मी हमको हमेशा दादी से दूर रखने की कोशिश करती। दादी सब काम करती, फि र भी मम्मी किसी-न-किसी बात पर उनसे झगड़ती रहती। ऐसा लगता था कि मौका ढूंढती थी लड़ाई करने या कोसने का। दादी हमेशा शांत रहती, मुस्कराती रहती। पापा हमेशा मेरी मम्मी को ही सपोर्ट करते। यही सब देखते-समझते मैं बड़ी हुई। मेरी शादी जल्दी कर दी गई। मेरी शादी के नाम पर मम्मी-पापा ने दादी के पास से सब जेवर, रुपए सब ले लिए। दादी मुझे प्यार करती थी। उन्होंने सबकुछ चुपचाप दे दिया। मेरी शादी जॉइंट फैमिली में हुई। तीन साल में दो बच्चे हो गए। इस बीच मेरा एक भाई मस्तिष्क ज्वर से गुजर गया। दूसरा नौकरी पर बाहर चला गया। अबकी बार पीहर आई, पर जल्दी-जल्दी वापस बुला ली गई। चूंकि सास-ससुर बूढ़े हैं, इस कारण ज्यादा रुक नहीं पाती पीहर में।
पीहर में दादी के बारे में पूछती रहती तो कहते कि चार धाम की यात्रा पर गई हैं। समय लगेगा। किसी संघ के साथ गई हैं आदि-आदि।
- मुझे समझ में नहीं आ रहा था। समझने का वक्त भी नहीं मिलता था। परिवार बड़ा, बच्चे छोटे।
- अभी 5-6 दिन पहले पीहर आई। दादी के बारे में पूछा, तो बताया कि दुबारा फेरी पर गई हैं हरिद्वार। मुझे दादी की बहुत याद आ रही थी। दिन में मेरे मम्मी-पापा सो रहे थे। तो पड़ोसन से बात करने लगी। बात-बात में दादी का जिक्र आ गया, तो वो चुप हो गई। फि र धीरे से बोली, तुम्हारी दादी हरिद्वार नहीं गई हैं।
- मैं सुनकर चुप थी। मैंने पूछा, तो कहां गई। उसने मुझसे प्रॉमिस लिया कि किसी को कुछ नहीं बताऊंंगी। फि र पड़ोसन ने मुझे सारी बातें बताइ कि किस तरह मेरी मां ने दादी को धक्के देकर/जलील कर घर से निकाल दिया। इस काम में मेरे पापा ने भी उनका पूरा साथ दिया। पड़ोसन ने ही बताया कि वे यहां अनुबन्ध में हैं। उसने यहां का पता बताया। सहेली के घर जाने का झूठा बहाना कर के मैं यहां आई हंू। मैडम, एक बार दादी से मिला दीजिए।
मैडम, मुझे मम्मी-पापा से लडऩे की इच्छा हो रही थी। मगर पहले दादी से मिलना चाह रही थी। जानना चाह रही थी कि क्या-क्या हुआ, क्यों हुआ। ...और फि र दादी हमेशा कहती थी, बेटा चुप्पी में ही सार है। सब्र रखना चाहिए।- मैंने बोला....आपने सारी बातें बताईं, पर ये तो बताओ कि आपकी दादी हैं कौन? क्या नाम है?- नाम सुना तो लगा कि हां ये महिला तो वाकई सीधी-सादी है। हमें तो कभी कोई शिकायत ही नहीं हुई उनसे।
- मैडम, बहुत झूठ बोलकर, इन छोटे बच्चों को लेकर बड़ी मुश्किल से पहुंची हंू। एक बार दादी से मिला दीजिए। कैसी है मेरी दादी। ठीक तो हैं....मुझे याद करती हैं क्या? बीमार तो नहीं....इत्यादि?
- पहली बार किसी पोती में दादी के प्रति इतना लगाव देख दिल भर गया।- मां को रोते देख। दोनों बच्चे रोने लगे।
- दोनों बच्चों को मैंने बिस्किट-टॉफ ी दी।
- मैंने उस दादी माँ को ऑफि स में बुलाया।- दादी ऑफि स में आई। पोती को देखा। उसके बच्चों को देखा। कुछ समझ नहीं पाई। इतने सालों बाद पोती...। मूल से ज्यादा ब्याज। गले मिलना, रोना सब अनएक्सपेक्टेड था।- दादी मुझे माफ कर दे। मुझे पता क्यों नहीं चला। क्यों यह सब हुआ। कैसे..., दादी, आपने मुझे फ ोन क्यों नहीं किया?
मम्मी-पापा ने मुझसे झूठ बोला। बचपन में भी वो हमेशा हमको आपसे दूर रखना चाहती थी...। अब तो हद ही हो गई। आज मुझे उनको मम्मी-पापा कहने में शर्म आ रही है। मैं आपको साथ ले जाती।
- दादी अभी भी सकते में। दोनों बच्चों को देखा। चुपचाप टॉफ ी खाते बच्चे। देखा, पुचकारा, प्यार किया, सिर पर हाथ फेरा। जाने कितनी दुआएं, आशीष...दिल से निकल रही थीं।
- रोते-रोते पोती ने कुछ रुपए निकाले। दादी को देने लगी। दादी ने बार-बार मना किया। फि र रुपए लिए और दोनों बच्चों को दे दिए। ...बोली मेरे पास और कुछ नहीं है देने को। मुझे पैसों की जरूरत ही नहीं है। यहां मुझे सब कुछ मिलता है। मैमसाब हैं हमारे लिए। मुझे कुछ नहीं चाहिए।
- कुछ देर दोनों ने जी भरकर बातें की। रोना, हंसना, दु:खी होना, हिम्मत बंधाना, दुनियादारी, ससुराल की, पीहर की बातें, किस्मत वगैरह....वगैरह।
- दादी-पोती का इतना प्यार देखा-आश्वस्त हुई। अगली पीढ़ी में संवेदनाएं बाकी हैं। डेढ़ घंटे बाद वो जाने के लिए उठी। ...बोली, मैडम किसी को मत बताना कि मैं यहां आई थी। मेरी दादी का ध्यान रखना। मेरी दादी बहुत सीधी है, बहुत अच्छी है। कभी भी कोई भी काम हो, मुझे फ ोन कर देना, ये हैं मेरे फ ोन नम्बर। जैसे ही मौका मिलेगा, मिलने आ जाऊंगी।
- दादी आप चिंता नहीं करना। मैं हंू...।
-जाने से पहले दादी ने उसे गले लगाया-पोती ने दादी के पांव छुए। दादी ने ढेर सारा आशीर्वाद दिया। धीरे से उसे समझाया कि वो अपने मम्मी-पापा से कुछ न कहे। शांति रखे, क्योंकि, चुप्पी में ही सार है...।
अनुराधा आडवाणी, संचालक, अनुबंध वृद्धजन कुटीर, नींबा नीमड़ी, मंडोर
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