़कई बार कलम बगावत कर देती है और चीख-चीख कर कहती है कि राजधर्म की नैतिकता में तुम बंधे हुए हो, मैं नहीं। तुम्हारी रगों का ख़ून सूख गया होगा, पर मेरे भीतर अभी भी सच्चाई की स्याही जिंदा है! पिछले काफी दिनों से जो हो रहा है, उसे सुन-पढ़ कर मन में एक दावानल-सा उबल रहा है।कभी एक दिन पुलिस वाले का जीवन जीकर देखेंहर जगह देखो, बस एक ही बात खाकी ने ये कर दिया, खाकी ने वो कर दिया! मैं उन सभी कलमनवीसों और खादीधारकों से कहना चाहता हूँ कि कभी एक दिन पुलिस वाले का जीवन जीकर देखें। अगर चैन के दो निवाले भी ले पाएं, तो हमें बताना। किसी भी सिस्टम के बाहर रहकर उसके गुण-अवगुण का आकलन किए बगैर नुक्ताचीनी करना बहुत ही आसान है। कोटा में अगर सीआई साहब की जगह आप होते, तो क्या करते चुपचाप सहन कर लेते। कोई नेता आए और अपराधियों का पक्ष ले और आपके पुलिस स्टेशन में आपके स्टाफ के सामने चांटा लगाए और फिर आपकी सरकार आपको दंडित करे और आपराधिक मुकदमे भी आपके खिलाफ ही दर्ज कर लिए जाएं। नहीं जी, पुलिस तो अनुशासित महकमा है, उसे तो चुपचाप पिट जाना चाहिए। उसे अपराधियों के साथ जवांई जैसा व्यवहार करना चाहिए।कोर्ट-कचहरी से अस्पताल तककभी आपने सोचा है कि पुलिस का व्यवहार ऐसा क्यूं है? कभी इस मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की है आपने? मैं आपको समझाता हूं कि पुलिस के अधिकारी और जवान का एक दिन कैसा होता है। सुबह आपको आठ बजे उठकर वर्दी पहन कर तैयार होना ही होगा। आप को सम्मन वारंट जो तामील के लिए दिए गए हैं, उन्हें तामील करवा कर सुबह दस बजे से पहले न्यायालय में जमा करवाने ही होते हैं। अगर समय पर नहीं करवा पाए, तो कोर्ट की फटकार और दंड अलग से तैयार है। कोर्ट से फ्री होते ही आपको कानून व्यवस्था, जुलूस वीआईपी सुरक्षा की ड्यूटी हेतु जाना है। फलां जगह मंत्रीजी आ रहे हैं, फलां एमएलए साहब की मीटिंग है। इसी दौरान अगर कहीं पथराव हो गया, तो भी आपको ही वहां जाना है। रास्ता रोक लिया गया या एक्सीडेंट हो गया, तब भी आपको ही जाना है। हां, सड़क पर घायल या मृत शरीर को कोई भी हाथ नहीं लगाएगा। यहां तक कि उसके परिवार और सगे सम्बन्धी भी नहीं। आपको ही उसे एम्बुलेंस में डालकर मानव धर्म निभाना है।देर रात घर सिर्फ सोने आते हैं पहरा संतरी ड्यूटी भी करनी है। तफ्तीश में गवाह मुलजिम के लिए भी जाना है। मुलजि़म की गिरफ़्तारी में वहां उसे अपना ही सिर लहूलुहान करवाना है। शाम होते होते संध्याकालीन गश्त लागू हो जाती है। जो रात्रि 11 बजे तक उसे ही करनी है। हां हर एक दिन छोड़ कर पूरी रात्रिकालीन गश्त निगरानी ड्यूटी भी करनी है। घर, बीवी व बच्चों के लिए तो वो एक मुसाफिर है, जो देर रात को घर पर सिर्फ सोने आता है और सुबह सवेरे उठते ही ड्यूटी पर भाग जाना है।नफरत की निगाहों से हम थक चुके हैंएक तस्वीर जालोर की है, जहां मुलजि़म को पकडऩे गई पुलिस की तथाकथित सभ्य जनता परिवार और नेताओं ने आवभगत की है। जिस मुलजिम को पकडऩे पुलिस गई थी, उसने किसी सिपाही के घर चोरी नहीं की और ना ही किसी सिपाही की बेटी के साथ बलात्कार किया, लेकिन पुलिस के लिए अपराध वैसा ही है, जैसा वो अपने साथ होना मानते हैं। प्लीज और प्लीज अब मन में भरी हुई गंदगी को बाहर निकाल फेंकें और आपकी सुरक्षा में लगे आपके भाई, दोस्त जैसी पुलिस का सहयोग करें। अब नफरत की निगाहों से हम थक चुके हैं। हम भी आप जैसे ही हैं। सिर्फ अपराध के खिलाफ हैं।
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