जोधपुर। राजस्थान की लोक कथाओं में सैकड़ों ऐसे पात्र है जिनकी गाथा को आज भी बड़े चाव के साथ सुनाया जाता है। ऐसी ही एक प्रेम कथा इलोजी-होलिका की है। होली के अवसर पर एक बार फिर इनकी प्रेम कथा वातावरण में गूंज उठती है। होलिका के प्रेमी इलोजी को अजर-अमर माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि वे आज भी क्षेत्र में भटक रहे है। मारवाड़ के कई गांवों में उनकी प्रतिमाएं स्थापित है और लोग उनकी पूजा करते है। मारवाड़ के जालोर में आज भी बाकायदा इलोजी की बारात निकलती है। उसमें सैकड़ों लोग अपनी भागीदारी निभाते है। ये है इलोजी-होलिका की प्रेम कथा…
असुर राज हिरणकश्यप की बहन होलिका और गंर्धव इलोजी एक-दूसरे को दिलोजान से चाहते थे।इलोजी उस समय के श्रेष्ठ योद्धा व बेहतरीन रंग रूप के धनी थी। उन्हें युद्ध में कोई नहीं हरा सकता था।होलिका भी अपने दौर की बहुत रूपवती युवती थी। सभी इस जोड़ी को सराहते थे।हिरणकश्यप नहीं चाहता था कि होलिका का विवाह इलोजी के साथ हो। हिरणकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान का भक्त था। ऐसे में असुर राज प्रहलाद को अपनी राह से हटाना चाहता था।प्रहलाद को मारने की योजना के तहत असुर राज ने होलिका का इलोजी के साथ विवाह करने की एवज में से मदद मांगी। इसके तहत उसे कहा गया कि वह होली दहन के दौरान अपनी गोद में प्रहलाद को लेकर बैठे।होलिका को अग्नि में भस्म नहीं होने का वरदान हासिल था। भारी मन से होलिका ऐसा करने को तैयार हो गई।साथ ही होलिका ने इलोजी को संदेश भेजा कि होली के दिन वे बारात लेकर पहुंच जाए।
भस्म हो गई होलिका-पागल हो गए इलोजी
होली के दिन होलिका अपने भतीजे भक्त प्रहलाद को गोद में लेकर होली दहन में बैठ गई।उसने अपना वरदान प्रहलाद को प्रदान कर दिया। होली दहन होने के दौरान होलिका तो जलकर भस्म हो गई, लेकिन प्रहलाद बच गया।होलिका के भस्म होते ही इलोजी अपनी बारात लेकर पहुंचे। तब तक सारा नजारा बदल चुका था।अपने प्रयेसी के वियोग में इलोजी होली दहन स्थल पर ठंडी पड़ चुकी आग में कूद गए।अपने कपड़े फाड़ कर इलोजी वहां पड़ी राख को अपने ऊपर लगाने लगे। और जोर-जोर से रोने लगे।इसके बाद इलोजी उसी वेष में वहां से रवाना हो गए और हमेशा क्षेत्र में भटकत रहे।ऐसी मान्यता है कि वे आज भी जिन्दा है और क्षेत्र में भटक रहे है।
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