जोधपुर शहर की कुछ बातें एेसी हैं जो सबको पता नहीं होती

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जोधपुर ।
जोधपुर शहर की कुछ बातें एेसी हैं जो सबको पता नहीं होती। इस कॉलम कानों-कान के जरिए जानिए शहर की अनसुनी और चटपटी बातें।
चुपके-चुपके क्यों गए ?
हाल ही सर्किट हाउस में केन्द्रीय मंत्री से मिलने गए मुखियाजी व अध्यक्षजी को द्वारपाल की तरह खड़े रहना पड़ा। इंतजार करते-करते चेहरे मुरझा गए। बिन बुलाए जाएंगे तो ऐसा ही होगा। यदि कार्यकर्ताओं की फौज के साथ जाते, तो शायद उनकी पूछ हो भी जाती। कानोंकान चर्चा है कि अध्यक्षजी व मुखियाजी को चुपके-चुपके जाकर राजनीति चमकाने का चस्का चढ़ा हुआ है। इसलिए अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं को किसी भी बड़े मामले की सूचना तक नहीं देते।
हट गया 'कांटा'
अपने शहर की सरकार में बड़े अफसर की आंख में किरकिरी बने छोटे अफसर रूपी कांटा हट गया। छोटे अफसर के तबादले का फरमान क्या आया, बड़े साब के चैम्बर में तो लड्डू बंट गए। कानोंकान खबर है कि छोटे वाले खुद ही तंग आकर यहां से रवानगी कर गए। वो आए दिन बड़े साब के काम में अडंग़ा अटका रहे थे, इसलिए बड़े साब को एक आंख नहीं सुहा रहे थे। अब बड़े साब खुलकर खेलने की तैयारी में हैं।
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किसका डंका बजा?
जोधपुर के एयरपोर्ट पर प्रदेशाध्यक्ष तो पहले भी कई आए, लेकिन स्वागत में ऐसी होड़ पहले नहीं देखी। सबकुछ पूर्व नियोजित जो था। हर कोई 'अध्यक्षजी तुम संघर्ष करो हम आपके साथ हैं' के नारे लगाने और मालाएं पहनाने के लिए उतावला था। जोरदार भीड़ देख अध्यक्षजी भी फूले नहीं समाए। मीडिया के समक्ष भीड़ का प्रदर्शन किया और मन ही मन कई लड्डू खा लिए। 
'सुरक्षा' बनी आम रास्तों में रुकावट
कानोंकान चर्चा आई कि यह शक्तिप्रदर्शन जोधपुर के बड़े नेताजी को संदेश देने के लिए था, ताकि वे भी किसी गलतफहमी में ना रहें कि उनके क्षेत्र में केवल उन्हीं का डंका बजता है। उनके दौरे की रात ही जोधपुर के बड़े नेता भी यहां आ पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच कथित वर्चस्व रूपी जंग के कारण कई छुटभैया तो अमसंजस में रहे कि किसके स्वागत में जाएं और किसके न जाएं।
फिर कैसे होगी सुनवाई?
अपने चौधरीजी ने जनसुनवाई कार्यक्रम शुरू तो कर दिया, लेकिन पार्टी के नेता ही दूर भाग रहे हैं। आगाज ही ऐसा रहा कि बुलाने के बावजूद न तो विधायक पहुंचे और न दूसरे नेताजी। जनसुनवाई कैसी हुई, यह तो जनता को पता है, लेकिन नेताओं के बीच चल रही आपसी खींचतान जरूर चौपाल में आ गई। खींचतान के कारण अफसरों ने भी जनसुनवाई को गंभीरता से नहीं लिया
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