"अशिक्षा ,बेरोजगारी तथा स्वास्थ्य -टीकाकरण में गुणवत्ता का अभाव चिंतित नहीं करता ,हां किसी अशिक्षित आंगनवाड़ी कार्यकर्ता,ANM या आशा को हटाया गया ,तो उस के पक्ष में लोग खड़े हो जाएंगे। "
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समस्याएं चिन्हित करना एक बात है समाधान के रास्ते खोजना दूसरी बात ।हमारे गांव में अशिक्षा है, बेरोजगारी है ,बीमारियां हैं ,जमीनों के विवाद में,मुकदमे हैं ।जात -पात की सामाजिक समस्याएं बरकरार है ।हाँ शोषण का वह रंग अब नहीं है ,जो प्रेमचंद के उपन्यासों में मुखर होता है ।उच्च वर्ग में श्रम से अरुचि ,दलित वर्ग में शिक्षा से अरुचि भी अभी भी वही की वही है । नगरों की और पलायन रुका नहीं। बेरोजगारी है, पर रोजगार संबंधित शिक्षा नहीं है। पर समाधान भी कोई रॉकेट साइंस नहीं है। अगर गांव के दसवीं पास लड़के को कृषि संबंधी व्यवहारीक जानकारी हो जाए तो वह अपने परिवार की भूमि पर विज्ञानिक तरीके से खेती बागवानी कर सकें। अगर हमारे परिवार में 3 से 5 बीघा जमीन है तो हमें कोई बताएं कि उस पर किस प्रकार आदर्श कृषि पशुपालन, बागबानी आदि की जा सकती है।
पर ऐसी ना तो कोई शिक्षा है ना ऐसी शिक्षा सोची गई है। इस कारण कृषि सम्भावना हिन् कार्य मान लिया गया है। गांव कस्बा में आईटीआई जैसा कोई संस्थान भी नहीं, जो कृषि कार्य की शिक्षा दे सके।
फिर कृषि आधारित रोजगार जैसे बीमा, खाद, कृषि उपकरण, पशु आधारित व्यवसाय भी तो है हर गांव में। अनाज के कारोबार की गुंजाइश है। पर खेती का माल बाजार के बनिये के पास ही जाएगा। उपज के सही दाम के लिए इस व्यवसाय का एकाधिकार समाप्त होना भी जरूरी है ।बैंक सहयोग दें तो ग्रामीण युवा भी यह कारोबार कर सकते हैं। पर ऐसा नहीं होता। सहकारी बैंक निष्क्रिय है।
गांव में राजनीतिक, जातिगत जागरूकता की बहुतायत है ।अभी पंचायत चुनाव हुए हैं ।हमारा सरपंच हमारे गांव का सरपंच नहीं हो पाता। वह अपने समर्थकों का ही सरपंच बना रहता है। और शिक्षा बेरोजगारी से उसका कोई वास्ता ही नहीं है ।
लगभग हर विभाग में ग्राम स्तरीय संविदा कर्मचारी भी बहुत हो गए हैं। चूंकी स्कूली सर्टिफिकेट फर्जी मिल जाते हैं ,इसलिए साक्षर होने की जरूरत नहीं। अंगूठाछाप महिलाएं भ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बनी हुई है। नतीजा स्वास्थ्य पोषण की आवश्यकताएं नेपथ्य में चली जाती है ।और दलिया बाजारों में बिकता मिलता है । हमारे विभिन्न ग्रामीण विभाग के कर्मियो में प्रशिक्षण के साथ जिम्मेदारी का अभाव है। जब आधारभूत योग्यता ही नहीं है तो फिर प्रशिक्षण कैसा?
अतुल डिंडा www.dangiyawasnews.com
ऐसे संस्थान भी नहीं है जो ग्रामीण सेवा से जुड़े कार्यों में प्रशिक्षण देते हो।प्रशन यह है कि ग्रामीण रोजगार व् सेवाओं के प्रति हमारी प्रशासनिक मशीनरी वह पंचायती व्यवस्था की प्रतिबद्धता है या नहीं ।
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गांव में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अशिक्षित है। पर वह सरपंच प्रधान की खास है ।त्यागपत्र के लिए कहे जाने पर बात उठती है कि विरोधी गुट की एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भी अंगूठा छाप है ,उनसे भी इस्तीफा लिया जाए तब वह इस्तीफा देगी । ऐसे में लोकतांत्रिक अथवा पंचायती शक्तियों का उपयोग विकास के लिए कैसे किया जाए ?
भीषण निरक्षरता को लेकर कोई पंचायती नेता चिंतित नही होता ।और बेरोजगारी ,स्वास्थ्य, सफाई टीकाकरण जैसी सेवाओ में गुणवत्ता का अभाव भी चिंता का कारण नहीं बन सका ।पर,हाँ, किसी अकर्मण्य आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अथवा आशा बहू को हटाया जाए तो उनकी पैरोकारी में लोग खड़े हो जाएंगे।
अतुल डिंडा www.dangiyawasnews.com
अशिक्षा है, तो स्वच्छता के प्रति जागरुकता का अभाव भी है। इक्कीस वी सदी में एक हाथ में मोबाइल और दूसरे हाथ में लोटा लिए लोग खेतों में शौच को जा रहे हैं। ग्रामीण समाज को शौचालय के उपयोग के लिए प्रेरित करने में आज जितना प्रयास करना पड़ रहा है, इतने में तो देश में सांस्कृतिक क्रांति हो जाती ।
टीकाकरण में हमारा जिला प्रदेश में क्या शायद देश में भी सबसे पीछे हो, इस बात से हमारी phc प्रभारी, डॉक्टरों को कोई शर्मिंदगी नहीं होती।आजादी के पहले से ही विकास के सबसे महत्वपूर्ण माध्यमों में सहकारिता अथवा कोआपरेटिव इकाइयों की गणना होती रही है।
महाराष्ट्र, गुजरात आदि में विकास का इंजन बन चुकी सहकारिता, हमारे यहां प्रारंभ में ही दम तोड़ गई।
बैंक छोटे कर्ज नहीं देते। जबकि जरूरत पड़ने पर गांव का आदमी साहूकार से उच्च ब्याज दर पर कर्ज लेने को मजबूर होता है। और अंततः अपनी जमीन दे बैठता है। गांव में माइक्रो फाइनेंस इकाइयां जरूरी है। चर्चित अर्थशास्त्री युनूस सलीम ने ग्रामीण बैंक और माइक्रो लोन के जरिये बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का चेहरा बदल दिया।
हमारी समस्याओं के समाधान अल्पकालीन नहीं है। यह गांव के माहौल को आमूलचूल बदलने वाली बात है। साक्षरता की तड़प कैसे पैदा हो ?
सहकारिता ग्रामीण शशक्तिकरण का माध्यम कैसे बने? संसाधनो की कमी नहीं है।कमी इच्छाशक्ति व् हमारी सोच में है।हर गाँव मैं प्राइमरी स्कूल में शिक्षक प्रतिदिन एक घंटा अतिरिक्त समय देखकर निरक्षर को साक्षर बना सकते हैं। उच्च माध्यमिक विद्यालयों में कृषि से संबंधित व्यवस्था की व्यावहारिक शिक्षा दी जा सकती है। ग्राम सभाओं की नियमित खुली बैठक के सहकार के रास्ते खोल सकती है ।
पर यह तब होगा जब हम इस दिशा में सोचेंगे
जय हिंद जय भारत
अतुल डिंडा www.dangiyawasnews.com
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