पुलिस : पदक, पोस्टिंग एवं प्रमोशन – पंकज चौधरी, आईपीएस

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"कोण कहता है की पहाड़ बड़े होते है ।
इन्सान के बच्चे ही उस पर खड़े होते है" ।।
किसी ने सच ही कहा है की अगर कोई इन्सान अपना लक्ष्य ठान ले तो उसे कोई भी समस्या पाने से नही रोक सकती । हर व्यक्ति का अपना एक लक्ष्य होता है एक सपना होता है जिसे वह पूरा करना चाहता है उस क्षेत्र विशेष के बारे में उसके कुछ विचार होते है जिसे वह चयनित होने से पहले सोचता है पर जब वह उस फील्ड में जाता है तो हकीकत कुछ देखने को मिलती है ।
आज के "पथ प्रदर्शक" संस्मरण में हम एक ऐसा ही लेख शेयर करने जा रहे है ।
जी हा । बात हो रही है युवा  ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी की ।
पुलिस : पदक, पोस्टिंग एवं प्रमोशन – पंकज चौधरी, आईपीएस

वर्ष 2009 में अपनी मनपसंद सर्विस में चयन होने पर अविस्मरणीय खुशी हुई थी। वर्ष 2009 से 2016 तक समय-समय पर कई अनुभवों एवं पुलिस को गहराई से समझने का अनुभव प्राप्त हुआ। पुलिस को समझने की कड़ी में सर्वप्रथम 20 अप्रेल 2009 को संघ लोक सेवा आयोग में पुरुषोत्तम अग्रवाल (चेयरमेन) के बोर्ड में साक्षात्कार देने का अवसर मिला। चेयरमेन साहब ने एक ही प्रश्न पूरे 35 मिनट के साक्षात्कार मेें बार-बार किया, वह था तुम आईपीएस क्यों बनना चाहते हो? आईएएस, आईएफएस अन्य क्यों नहीं? इस प्रश्न का सही जवाब तभी दिया जा सकता था, जब आप इस नौकरी को पूरी तरह आत्मसात करने को तैयार हैं। आईपीएस पहली पसंद पर तमाम तर्क वितर्क होते-होते 35 मिनट का समय समाप्त हुआ। साक्षात्कार से आत्मसंतुष्टि थी, क्योंकि यह महसूस हो रहा था कि बोर्ड के प्रश्नों का सहज एवं तार्किक जवाब दे दिया गया है, 4 मई 2009 को रिजल्ट आता है। साक्षात्कार में 230 अंक प्राप्त हुए, जो उस वर्ष प्राप्त किए गए अंकों में सर्वाधिक थे। मुझे वांछित सर्विस (आईपीएस) प्राप्त हुई। आगे दौर शुरू हुआ बधाईयों एवं ट्रेनिंग का। टे्रनिंग के दौरान मुझे भारतवर्ष से चयनित आईएएस, आईपीएस अधिकारियों एवं अन्य सर्विस के अधिकारियों के साथ सीखने, समझने का अवसर प्राप्त हुआ।
मई 2009 से जनवरी 2016 तक पिछले सात वर्षों में पुलिस की आंतरिक एवं बाह्य संरचना समझने का पर्याप्त अवसर मिल चुका था। सर्वप्रथम उपरोक्त टाइटल पुलिस पदक, पोस्टिंग एवं प्रमोशन में पोस्टिंग को लेकर तमाम उतार-चढ़ाव देखने को मिले, जिससे पुलिस को समझने में आसानी हुई। मसूरी, हैदराबाद से टे्रनिंग कर भारत दर्शन के पश्चात् राजस्थान कैडर की सेवा देने का अवसर मिला। लगभग दो वर्षों की टे्रनिंग जिसमें कोटा शहर, जयपुर (पश्चिम), झालावाड़, बांसवाड़ा कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। टे्रनिग के दौरान अनुभवों एवं अन्य संवैधानिक मूल्यों को परखने के क्रम में पुलिस अधीक्षक के रूप में जैसलमेर पोस्टिंग हुई। लगभग पांच माह का कार्यकाल कई उतार-चढ़ाव एवं वैचारिक द्वंद के साथ गुजरा। एक पूर्ण संतुष्टि के साथ पोस्टिंग के अन्य पहलुओं को जानने का मौका मिला। प्रिंसिपल पुलिस टे्रनिंग स्कूल किशनगढ़ (अजमेर) उसके अलावा बून्दी पुलिस अधीक्षक, कमाण्डेंट आर.ए.सी. दिल्ली एवं पुलिस अधीक्षक एस.सी.आर.बी. के रूप में पुलिस विभाग के कई आयामों को गहराई से समझने के लिए पर्याप्त मान सकता हंू।
हाल में ही समाचार पत्रों के माध्यम से कुछ अधिकारियों को राष्ट्रपति पदक सम्मानित करने की सूचना मिली। पोस्टिंग के उतार चढ़ाव को स्वयं द्वारा अच्छी तरह से समझा जा चुका था, परन्तु पदक के बारे में वस्तुस्थिति समझ पाना आवश्यक था। दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (ए.डी.जी.पी.) जिनके साथ कार्य करने का मौका मिल चुका था। एक का पदक मिलना सकारात्मक अनुभूति दे गया, परन्तु दूसरे का पदक सोचने पर मजबूर कर गया। ऐसा इसलिए की इस अधिकारी के साथ हाल ही में लगभग एक वर्ष कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। इस अधिकारी को नि:संदेह पदक रूटीन में प्राप्त हो गया, परन्तु यह प्रश्न बार-बार सोचने पर विवश कर रहा था कि ऐसे अधिकारी को पदक मिलना भी चाहिए अथवा नहीं? जिस अधिकारी ने सर्विस पर्यन्त पोस्टिंग के लिए चापलूसी, भ्रष्टाचार, अधीनस्थों को प्रताडि़त करना, व्यवस्था में लॉबी परम्परा को बढ़ाना, जातिवाद को बढ़ाना, दूसरों की कमियों का अवसर उठाना, पुलिस परिवार को यथा संभव विभिन्न धाराओं में तोडऩे का प्रयास करना शामिल है। ऐसा इसलिए स्पष्ट कर पा रहा हंू, क्योंकि ऐसे अधिकारी के साथ हाल में लगभग एक वर्ष कार्य करने का मौका मिला।
पदक की वस्तुस्थिति जानने के उपरान्त प्रमोशन की गहराई एवं वस्तुस्थिति को समझने की तीव्र इच्छा महसूस हुई, इस कड़ी में भी बड़ा मापदण्ड एवं समीकरण नजर आए जो नकारात्मक रूप से पदक पाए वरिष्ठ अधिकारी के साथ जुड़ा था। पुलिस व्यवस्था में समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं। वर्तमान में पदक, पोस्टिंग, प्रमोशन को गहराई से समझने पर अहसास होता है कि क्या पुलिस अधिकारी एवं अन्य के लिए राष्ट्रवाद के मायने बदल गये हैं? क्या यह व्यवस्था उसी ब्रिटिश व्यवस्था (जनक) के संशोधित रूप में वर्तमान में व्यक्त हो रही है?
अमिताभ ठाकुर (आईपीएस), उत्तरप्रदेश, संजीव चतुर्वेदी (आईएफएस), हरियाणा जैसे अधिकारियों का निरन्तर संघर्ष देख ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी व्यवस्था में ऐसे अधिकारी फिट क्यों नहीं हैं? क्या वे संवैधानिक नियमों का पालन करते हैं इसलिए? क्या आम जनता के हितों का ध्यान रखते हैं? क्या वे जाति, धर्म से बाहर संविधान को सर्वोपरी मानते हैं? स्वयं के पिछले 7 वर्षों का पुलिस विभाग में अनुभव कुछ ऐसे ही प्रश्नों पर सोचने पर मजबूर करता है। इस प्रकार के अधिकारियों को व्यवस्था क्यों आत्मसात नहीं कर पा रही है? आध्यात्मिक सोच अनुसार क्या कलयुग का दौर है? ऐसा इसलिए हो रहा है? क्या भ्रष्टों की तादाद इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है, कि ऐसे लोगों का अस्तित्व संकट में है? क्या जनता ने भी इस व्यवस्था को चलाने वाले अधिकांश भ्रष्टों को आत्मसात कर लिया है? इस मूल प्रश्नों के साथ इस उम्मीद के साथ सकारात्मक रूप से आशान्वित हूं कि कभी ना कभी इस व्यवस्था में जिसमें भ्रष्टों का बोलबाला है, इनकी संख्या कम होगी एवं ऐसे लोग जो संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने में कुछ भी करने को तैयार हैं, संख्या बढ़ेगी।
परिवर्तन सृष्टि का मुख्य तत्व है। जय हिन्द, जय भारत।

– न जाति, न धर्म, न क्षेत्र, – देश सर्वोपरी, जय हिन्द –

(लेखक पंकज चौधरी 2009 बैच के आई.पी.एस. अधिकारी हैं। पंकज लेखन से गहरा लगाव रखते हैं। पुस्तकों से पंकज का पुराना रिश्ता है। अपने कामकाज, राष्ट्रप्रेम और सबको साथ लेकर चलने की मुहिम के चलते देशभर के चर्चित युवा आई.पी.एस. अधिकारियों में उनकी गिनती होती है।

   प्रस्तुति :-
ओम डांगी
अतुल डिंडा
राजकुमार सिंह आजाद

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