आँखों के दरमियान मैं गुलिस्तां दिखाता हुँ,
आना कभी मेरे गाव मैं आपको डांगियावास दिखाता हुँ|
गाव में घुसते ही स्टेशन का माहोल दिखता हु
बाल मजदूरो को दुकान पर चाय पिलाने की व्यथा दिखाता हु ।
गाँव में आते ही अमर बनी छत्रिया दिखाता हु
ऊमा भारतीजी की पर्चो की कथा सुनाता ह
सोने सी माटी मे पानी का अरमान बताता हुँ,
आना कभी मेरे गाव में आपको डांगियावास दिखाता ह
मीठी बोली, मीठे पानी मे डांगियावास की सैर करता हुँ,
घूँघट में लिपटी मर्यादा पग पग इज्जत का मौल बताता हु
संध्या काल में जब आये युवा स्टेशन का माहौल दिखाता हु
प्रेम भाईचारा अपनापन का एहसास करता ह
महादेव की पूजा करके में हनुमान मंदिर जाता ह
ठाकुरजी के मंदिर में सुबह सुबह आरती सुनाता हु
दुकाने दिखाता हु में गाँव की गलिया दिखाता हु
नजरे ठहर न जाये कही में विशवकर्मा मंदिर दिखाता हु
लालदास जी के दोहों से लेकर रामदेव जी के उसुल पढाता हु
केसरियाकंवर जी के मंदिर से में विशव शांति की बात सुनाता हु
जीते सी इस धरती पर स्वर्ग का मैं वरदान दिखाता हु
होठो पे मुस्कान लिए, मुछो पे ताव देते जाटो की परिभाषा बताता हुँ|
मुस्लिमो की बस्ती मे, पूजा के बाद अज़ान सुनाता हुँ,
आना कभी मेरे गाँव मै आपको डांगियावास दिखाता हुँ||
नोट : यह कविता डांगियावास के एक युवा साथी ओम डांगी दुअरा एक छोटा सा प्रयास है सभी मित्रो से निवेदन है की इसके पीछे कोई और नाम नही जोड़े । में अपनी म्हणत सफल समझूगा ।
कृपया इसे अधिक से अधिक शेयर करे ।धन्यवाद
ओम डांगी
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