काले स्वेटर में बारह साल।
आज सुबह-सुबह एक मित्र आ धमके।
देखते ही आगबबूला हो गए। अब कितने दिन
और पहनोगे? जब आता हूं
यही काला स्वेटर पहने
दोहरी-तिहरी रज़ाई में घुसे दिखते
हो। पांच -छे साल से देख रहा हूं। कब तक
पहनोगे? रिटायर करो।
मैं शून्य में निहारते हुए बताता हूं - पांच छे
नहीं यार पूरे 12 साल हो गए हैं।
मित्र थोड़ी देर तक बकर-झकर किये। चाय सुड़के और
चलते बने। इस ताकीद के साथ कि अगली बार
आऊं तो ये पहने न दिखना।
उनके जाते ही मैंने कमरे में
उनकी मौजूदगी से बने माहौल को फूं-
फां किया। और अपने स्वेटर की ओर मुखातिब हुआ
- दोस्त, एक और पैदा हुआ तुम्हारा दुश्मन। लेकिन तुम
घबराना नहीं। कोई कुछ भी कहे।
12 साल का लंबा सफ़र साथ-साथ तय किया है हम दोनों ने।
कोई मज़ाक नहीं। तुम्हें
नहीं छोड़ सकता ऐ काले दोस्त। मेरे फेयर रंग के
साथ काला रंग बहुत मैच करता है। गोरे रंग पे इतना न गुमान
कर.…मुझे ये बात कई लोगों ने बताई। काले दिल
वालों की काली नज़र से बचाया है तुमने।
नज़र न लग जाये किसी की राहों में.…
पांच बार स्कूटर से गिरा हूं। तीन बार
तो तुम्हीं थे मेरे तन पर।
मेरी फरमाइश पर मेमसाब ने तुम्हें रिकॉर्ड समय में
बनाया। तुम एक मात्र आइटम हो जो मेरी पसंद से
बनाये गए और आज तक मेरी मर्ज़ी से मेरे
घर में हो।
पहले दो साल तक मैं तुम्हें सिर्फ पार्टियों में
पहनता रहा। लेकिन बाद में रेगुलर पहनने लगा।
ऑफिस में और बाहर भी। कई साल तक ये
सिलसिला चला। तुम्हें मेरे तन पर देख लोग आजिज़ आ गए।
जलने लगे।
तुम मेरी पहचान भी बने। कोई
बाहर से आता तो मातहत कहते - जाओ भैया देख
लो किसी फ्लोर पर कहीं विचर
रहे होंगे। जो फुल आस्तीन काला स्वेटर मिले,
समझना साहब इसी में धरे हुए हैं।
जब एक से बढ़ कर एक नए स्वेटरों की आमद
हो गयी तो पुराने पीछे चले गए। लेकिन
पुराना होने की बावज़ूब मैंने इसे
छोड़ा नहीं। घर में पहनने लगा।
आदत के मुताबिक ऑफिस से लौटने के बाद मैं ड्रेस चेंज
करता हूं। और घर वाली ड्रेस धारण कर
लेता हूं । इसमें ये काला स्वेटर
मेरी पहली पसंद है। रात रज़ाई में
भी मेरे साथ सोता है।
सर्दियों में जब
सुस्ती ज्यादा होती है
तो इसी स्वेटर के ऊपर जर्सी पहन मैं
अक्सर बाज़ार भी हो हूं। कई बार ऑफिस
भी गया। वहां हीटर चलते
हैं। जर्सी उतारनी पड़ी।
किसी ने कमेंट नहीं किया - सर क्या ये
स्वेटर वही पुराना वाला है?
अभी पिछले हफ्ते एक रिसेप्शन में इसे पहन
कर जाने लगा। पत्नी ने टोका भी। मैंने
कहा कोई जर्सी उतरवा कर
तो देखेगा नहीं कि स्वेटर नया है या पुराना और
किस ब्रांड का है। और फिर रात में क्या पता चलता है।
सबसे बड़ी बात तो ये रिसेप्शन
मेरा नहीं है।
हमारे एक मित्र को शक है कि मेरे पास ऐसे
ही तीन-चार स्वेटर हैं। बदल-
बदल कर पहनता हूं।
थोड़ा बूढ़ा हो चला है ये स्वेटर।
इसकी बाहें लटक चुकी हैं।
नीचे से भी काफी लटक
गया है। इसे मोडूं
नहीं तो पूरा झबला दिखता है।
बहरहाल, मैंने तय कर लिया है बारह साल
का सफ़र पूरा हो चुका, और अब बचे हुए सफ़र में
भी ये तन से लगा रहेगा। और साथ
ही जायेगा। ब-होशो-हवास मैं
दीवाना ये आज वसीहत
करता हूं.…
Atul Dhinda
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